ऋग्वेद 1.24.15

उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यमं श्रथाय। अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम॥15॥

पदपाठ — देवनागरी
उत्। उ॒त्ऽत॒मम्। व॒रु॒ण॒। पाश॑म्। अ॒स्मत्। अव॑। अ॒ध॒मम्। वि। म॒ध्य॒यमम्। श्र॒थ॒य॒। अथ॑। व॒यम्। आ॒दि॒त्य॒। व्र॒ते। तव॑। अना॑गसः। अदि॑तये। स्या॒म॒॥ 1.24.15

PADAPAATH — ROMAN
ut | ut-tamam | varuṇa | pāśam | asmat | ava | adhamam | vi | madhyayamam | śrathaya | atha | vayam | āditya | vrate | tava | anāgasaḥ | aditaye | syāma

देवता —        वरुणः;       छन्द        विराट्त्रिष्टुप् ;       स्वर        धैवतः;      
ऋषि         शुनःशेप आजीगर्तिः  स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः

मन्त्रार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती हे (वरुण) स्वीकार करने योग्य ईश्वर! आप (अस्मत्) हम लोगों से (अधमम्)निकृष्ट (मध्यमम्) मध्यम अर्थात् निकृष्ट से कुछ विशेष (उत्) और (उत्तमम्)अति दृढ़ अत्यन्त दुःख देनेवाले (पाशम्) बन्धन को (व्यवश्रथाय) अच्छेप्रकार नष्ट कीजिये (अथ) इसके अनन्तर हे (आदित्य) विनाशरहित जगदीश्वर !(तव) उपदेश करनेवाले सबके गुरु आपके (व्रते) सत्याचरण रूपी व्रत को करके(अनागसः) निरपराधी होके हम लोग (अदितये) अखण्ड अर्थात् विनाशरहितसुखके लिये (स्याम) नियत होवें॥15॥

भावार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
जो ईश्वर की आज्ञा को यथावत् नित्य पालन करते हैं वे ही पवित्र और सबदुःख बन्धनों से अलग होकर सुखों को निरन्तर प्राप्त होते हैं॥15॥       तेईसवें सूक्त के कहे हुये वायु आदि अर्थों के अनुकूल प्रजापति आदि अर्थों के कहने से इस चौबीसवें सूक्त की उक्त सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननीचाहिये॥
प्रथमाष्टक के प्रथमाध्याय में यह पन्द्रहवां वर्ग तथा प्रथम मण्डल के
षष्ठानुवाक में चौबीसवां सूक्त समाप्त हुआ॥24॥

रामगोविन्द त्रिवेदी (सायण भाष्य के आधार पर)
15. वरुण! मेरी ऊपरी पाश ऊपर से और नीचे का नीचे से खोल दो और बीच का पाश भी खोलकर शिथिल करो। अनन्तर है अदितिपुत्र! हम तुम्हारे व्रत का खण्डन न करके पापरहित हो जायेंगे।

Ralph Thomas Hotchkin Griffith
15. Loosen the bonds, O Varuna, that hold me, loosen the bonds above, between, and under. So in thy holy law may we made sinless belong to Aditi, O thou Aditya. 

Translation of Griffith Re-edited  by Tormod Kinnes
Loosen the bonds, Varuna, that hold me, loosen the bonds above, between, and under. So in your holy law may we made sinless belong to Aditi, you Aditya.

H H Wilson (On the basis of Sayana)
15. Varuna, loosen for me the upper, the middle, the lower band; so, son of Aditi, shall we, through faultlessness in the worship, become freed from sin.
The text has uttamam-adhamam madhyamam pasam ucchrathaya, loosen the upper, lower, and middle-bond; meaning, according to Sayana, the ligature fastening the head, the feet, and the waist; the result, however, is not loosening from actual bonds, but from those of sin: anagasah syama, may we be sinless.

ऋग्वेद 1.24.14

अव ते हेळो वरुण नमोभिरव यज्ञेभिरीमहे हविर्भिः। क्षयन्नस्मभ्यमसुर प्रचेता राजन्नेनांसि शिश्रथः कृतानि॥14॥

पदपाठ — देवनागरी
अव॑। ते॒। हेळः॑। व॒रु॒ण॒। नमः॑ऽभिः। अव॑। य॒ज्ञेभिः॑। ई॒म॒हे॒। ह॒विःऽभिः॑। क्षय॑न्। अ॒स्मभ्य॑म्। अ॒सु॒र॒। प्र॒चे॒त॒ इति॑ प्रऽचेतः। राज॑न्। एनां॑सि। शि॒श्र॒थः॒। कृ॒तानि॑॥ 1.24.14

PADAPAATH — ROMAN
ava | te | heḷaḥ | varuṇa | namaḥ-bhiḥ | ava | yajñebhiḥ | īmahe | haviḥ-bhiḥ | kṣayan | asmabhyam | asura | pracetaitipra-cetaḥ | rājan | enāṃsi | śiśrathaḥ | kṛtāni

देवता —        वरुणः;       छन्द        त्रिष्टुप् ;       स्वर        धैवतः;      
ऋषि         शुनःशेप आजीगर्तिः  स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः

मन्त्रार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
हे (राजन्) प्रकाशमान (प्रचेतः) अत्युत्तम विज्ञान् (असुर) प्राणों में रमने (वरुण)अत्यन्त प्रशंसनीय (अस्मभ्यम्) हमको विज्ञान देनेहारे भगवन् जगदीश्वर ! जिसलिये हम लोगों के (कृतानि) किये हुए (एनांसि) पापों को (क्षयन्) विनाश करते हुए(अवशिश्रयः) विज्ञान आदि दान से उनके फलों को शिथिल अच्छे प्रकार करते हैं इसलिये हम लोग (नमोभिः) नमस्कार वा (यज्ञेभिः) कर्म उपासना और ज्ञान और(हविर्भिः) होम करने योग्य अच्छे-अच्छे पदार्थों से (ते) आपका (हेडः) निरादर (अव)न कभी (ईमहे) करना जानते और मुख्य प्राण की भी विद्या को चाहते हैं॥14॥

भावार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
मनुष्यों को उचित है कि जैसे परमेश्वर के रचे हुए संसार में पदार्थ करके प्रकट किये हुए बोध से किये पाप कर्मों को फलों से शिथिल कर देवें वैसा अनुष्ठान करें। जैसे अज्ञानी पुरुष को पाप फल दुःखी करते हैं वैसे ज्ञानी पुरुष को दुःख नहीं दे सकते॥14॥

रामगोविन्द त्रिवेदी (सायण भाष्य के आधार पर)
14. वरुण! नमस्कार करके हम तुम्हारे क्रोध को दूर करते हैं और यज्ञ में हव्य देकर भी तुम्हारा क्रोध दूर करते हैं। हे असुर! प्रचेतः! राजन्! हमारे लिए इस यज्ञ में निवास करके हमारे किये हुए पाप को शिथिल करो।

Ralph Thomas Hotchkin Griffith
14. With bending down, oblations, sacrifices, O Varuna, we deprecate thine anger: Wise Asura, thou King of wide dominion, loosen the bonds of sins by us committed. 

Translation of Griffith Re-edited  by Tormod Kinnes
With bending down, oblations, sacrifices, Varuna, we deprecate your anger: Wise Asura, you King of wide dominion, loosen the bonds of sins by us committed. [14]

H H Wilson (On the basis of Sayana)
14. Varuna we deprecate your wrath with prostrations, with sacrifices, with oblations: averter of misfortune, wise and illustrious, be present amongst us, and mitigate the evils we have committed.
Averter of Misfortune– The text has, asura, which is interpreted, anista-ksepana-sila, accustomed to cast off what is undesired; from the root as, to throw: it is an unusual sense of the word, but it would scarcely be decourous to call Varuna an asura.

ऋग्वेद 1.24.13

शुनःशेपो ह्यह्वद्गृभीतस्त्रिष्वादित्यं द्रुपदेषु बद्धः। अवैनं राजा वरुणः ससृज्याद्विद्वाँ अदब्धो वि मुमोक्तु पाशान्॥13॥

पदपाठ — देवनागरी
शुनः॒शेपः॑। हि। अह्व॑त्। गृ॒भी॒तः। त्रि॒षु। आ॒दि॒त्यम्। द्रु॒ऽप॒देषु॑। ब॒द्धः। अव॑। ए॒न॒म्। राजा॑। वरु॑णः। स॒सृ॒ज्या॒त्। वि॒द्वान्। अद॑ब्धः। वि। मु॒मो॒क्तु॒। पासा॑न्॥ 1.24.13

PADAPAATH — ROMAN
śunaḥśepaḥ | hi | ahvat | gṛbhītaḥ | triṣu | ādityam | dru-padeṣu | baddhaḥ | ava | enam | rājā | varuṇaḥ | sasṛjyāt | vidvān | adabdhaḥ | vi | mumoktu | pāsān

देवता —        वरुणः;       छन्द        भुरिक्पङ्क्ति ;       स्वर        धैवतः;      
ऋषि         शुनःशेप आजीगर्तिः  स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः

मन्त्रार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती जैसे (शुनः शेपः) उक्त गुणवाला विद्वान् (त्रिषु) कर्म उपासना और ज्ञान में(आदित्यम्) अविनाशी परमेश्वर का (अह्वत्) आह्वान करता है वह हम लोगों ने(गृभीतः) स्वीकार किया हुआ उक्त तीनों कर्म उपासना और ज्ञान को प्रकाशितकराता है। और जो (द्रुपदेषु) क्रिया कुशलता की सिद्धि के लिये विमान आदियानों के खम्भों में (बद्धः) नियम से युक्त किया हुआ वायु ग्रहण किया है।वैसे वह लोगों को भी ग्रहण करना चाहिये जैसे-जैसे गुणवाले पदार्थ को(अदब्धः) अति प्रशंसनीय (वरुणः) अत्यन्त श्रेष्ठ (राजा) और प्रकाशमानपरमेश्वर (अवससृज्यात्) पृथक्-पृथक् बनाकर सिद्ध करे। वह हम लोगों को भीवैसे ही गुणवाले कामों में संयुक्त करे। हे भगवन् परमेश्वर ! आप हमारे (पाशान्) बन्धनों को (विमुमोक्तु) बार-बार छुड़वाइये। इस प्रकार हम लोगों की क्रियाकुशलता में संयुक्त किये हुये प्राण आदि पदार्थ (पाशान्) सकल दरिद्ररूपीबन्धनों को (विमुमोक्तु) बार-बार छुड़वा देवें वा देते हैं॥13॥

भावार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
इस मन्त्र में भी लुप्तोपमा और श्लेषालंकार हैं। परमेश्वर ने जिस-जिस गुणवालेजो-जो पदार्थ बनाये हैं उन-उन पदार्थों के गुणों को यथावत् जानकर इन-इनको कर्म उपासना और ज्ञान में नियुक्त करे जैसे परमेश्वर न्याय अर्थात्न्याययुक्त कर्म करता है वैसे ही हम लोगों को भी कर्म नियम के साथनियुक्त कर जो बन्धनों के करनेवाले पापात्मक कर्म हैं उनको दूर ही सेछोड़कर पुण्यरूप कर्मों का सदा सेवन करना चाहिये॥13॥

रामगोविन्द त्रिवेदी (सायण भाष्य के आधार पर)
13. शुनःशेप ने घृत और तीन काठों में आबद्ध होकर अदिति के पुत्र वरुण का आह्वान किया था। इसी लिए विद्वान् और दयालु वरुण ने शुनःशेप को मुक्त किया था, उनका बन्धन छुड़ा दिया था।

Ralph Thomas Hotchkin Griffith
13. Bound to three pillars captured Sunahsepa thus to the Aditya made his supplication. Him may the Sovran Varuna deliver, wise, ne’er deccived, loosen the bonds that bind him. 

Translation of Griffith Re-edited  by Tormod Kinnes
Bound to three pillars captured Sunahsepa thus to the Aditya made his supplication. Him may the Sovran Varuna deliver, wise, never deccived, loosen the bonds that bind him. [13]

H H Wilson (On the basis of Sayana)
13. Sunahsepas, seized and bound to the three-footed tree, has invoked the son of Aditi: may the regal Varuna wise and irresistible, liberate him; may he let loose his bonds.
Trisu drupadesu. Druh, a tree, is here said to mean the sacrificial post, a sort of tripod; its specification is consistent with the popular legend.

ऋग्वेद 1.24.12

तदिन्नक्तं तद्दिवा मह्यमाहुस्तदयं केतो हृद आ वि चष्टे। शुनःशेपो यमह्वद्गृभीतः सो अस्मान्राजा वरुणो मुमोक्तु॥12॥

पदपाठ — देवनागरी
तत्। इत्। नक्त॑म्। तत्। दिवा॑। मह्य॑म्। आ॒हुः॒। तत्। अ॒यम्। केतः॑। हृ॒दः। आ। वि। च॒ष्टे॒। शुनः॒शेपः॑। यम्। अह्व॑त्। गृ॒भी॒तः। सः। अ॒स्मान्। राजा॑। वरु॑णः। मु॒मो॒क्तु॒॥ 1.24.12

PADAPAATH — ROMAN
tat | it | naktam | tat | divā | mahyam | āhuḥ | tat | ayam | ketaḥ | hṛdaḥ | ā | vi | caṣṭe | śunaḥśepaḥ | yam | ahvat | gṛbhītaḥ | saḥ | asmān | rājā | varuṇaḥ | mumoktu

देवता —        वरुणः;       छन्द        निचृत्त्रिष्टुप् ;       स्वर        धैवतः;      
ऋषि         शुनःशेप आजीगर्तिः  स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः

मन्त्रार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती विद्वान् लोग (नक्तम्) रात (दिवा) दिन जिस ज्ञान का (आहुः) उपदेश करते हैं (तत्)उस और जो (मह्यम्) विद्या धन की इच्छा करनेवाले मेरे लिये (हृदः) मन के साथआत्मा के बीच में (केतः) उत्तम बोध (आविचष्टे) सब प्रकार से सत्य प्रकाशित होता है(तदित्) उसी वेद बोध अर्थात् विज्ञान को मैं मानता कहता और करता हूँ (यम्)जिसको (शुनः शेपः) अत्यन्त ज्ञानवाले विद्या व्यवहार के लिये प्राप्त और परमेश्वर वासूर्य्य का (अह्वत्) उपदेश करते हैं जिससे (वरुणः) श्रेष्ठ (राजा) प्रकाशमान परमेश्वरहमारी उपासना को प्राप्त होकर (अस्मान्) हम पुरुषार्थी धर्मात्माओं को पाप और दुःखोंसे (मुमोक्तु) छुड़ावे और उक्त सूर्य्य भी अच्छे प्रकार जाना और क्रिया कुशलता में युक्तकिया हुआ बोध (मह्यम्) विद्या धन की इच्छा करनेवाले मुझको प्राप्त होता है (सः) हमलोगों को योग्य है कि उस ईश्वर की उपासना और सूर्य्य का उपयोग यथावत् किया करें॥12॥

भावार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
इस मन्त्र में श्लेषालंकार है। सब मनुष्यों को इस प्रकार उपदेश करना तथा माननाचाहिये कि विद्वान् वेद और ईश्वर हमारे लिये जिस ज्ञान का उपदेश करते हैं तथा हमजो अपनी शुद्ध बुद्धि से निश्चय करते हैं वही मुझको और हे मनुष्यो ! तुम सब लोगोंको स्वीकार करके पाप और अधर्म करने से दूर रखा करे॥12॥

रामगोविन्द त्रिवेदी (सायण भाष्य के आधार पर)
12. दिन और रात, सदा लोभ में मुझसे ऐसा ही कहा गया है। मेरा हृदयस्थ ज्ञान भी यही गवाही देता है कि, आबद्ध होकर शुन:शेप ने जिस वरुण का आह्वान किया था, वही वरुणराज हम लोगों को मुक्तिदान करें।

Ralph Thomas Hotchkin Griffith
12 Nightly and daily this one thing they tell me, this too the thought of mine own heart repeateth.  May he to whom prayed fettered Sunahsepa, may he the Sovran Varuna release us. 

Translation of Griffith Re-edited  by Tormod Kinnes
Nightly and daily this one thing they tell me, this too the thought of mine own heart repeateth. May he to whom prayed fettered Sunahsepa, may he the Sovran Varuna release us. [12]

H H Wilson (On the basis of Sayana)
12. This (your praise) they repeat to me by night and by day: this knowledge speaks to my heart; may he whom the fettered Sunahsepas has invoked, may the regal Varuna set us free.

ऋग्वेद 1.24.11

तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः। अहेळमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मा न आयुः प्र मोषीः॥11॥

पदपाठ — देवनागरी
तत्। त्वा॒। या॒मि॒। ब्रह्म॑णा। वन्द॑मानः। तत्। आ। शा॒स्ते॒। यज॑मानः। ह॒विःऽभिः॑। अहे॑ळमानः। व॒रु॒ण॒। इ॒ह। बो॒धि॒। उरु॑ऽशंस। मा। नः॒। आयुः॑। प्र। मो॒षीः॒॥ 1.24.11

PADAPAATH — ROMAN
tat | tvā | yāmi | brahmaṇā | vandamānaḥ | tat | ā | śāste | yajamānaḥ | haviḥ-bhiḥ | aheḷamānaḥ | varuṇa | iha | bodhi | uru-śaṃsa | mā | naḥ | āyuḥ | pra | moṣīḥ

देवता —        वरुणः;       छन्द        निचृत्त्रिष्टुप् ;       स्वर        धैवतः;      
ऋषि         शुनःशेप आजीगर्तिः  स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः

मन्त्रार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
हे (उरुशंस) सर्वथा प्रशंसनीय (वरुण) जगदीश्वर ! जिस (त्वा) आपका आश्रय लेके(यजमानः) उक्त तीन प्रकार यज्ञ करनेवाला विद्वान् (हविर्भिः) होम आदि साधनों से (तत्)अत्यन्त सुख की (आशास्ते) आशा करता है उन आपको (ब्रह्मणा) वेद से स्मरण और अभिवादन तथा (अहेड़मानः) आपका अनादर अर्थात् अपमान नहीं करता हुआ मैं (यामि)आपको प्राप्त होता हूँ। आप कृपा करके मुझे (इह) इस संसार में (बोधि) बोध युक्त कीजिये और (नः) हमारी (आयुः) उमर (मा) (प्रमोषीः) मत व्यर्थ खोइये अर्थात् अतिशीघ्र मेरे आत्मा को प्रकाशित कीजिये।1।  (तत्) सुख की इच्छा करता हुआ (यजमानः) तीन प्रकार के यज्ञ का अनुष्ठान करनेवाला जिस (उरुशंस) अत्यन्त प्रशंसनीय (वरुण) सूर्य को(आशास्ते) चाहता है (त्वा) उस सूर्य्य को (ब्रह्मणा) वेदोक्त क्रिया कुशलता से (वन्दमानः)स्मरण करता हुआ (अहेड़मानः) किन्तु उसके गुणों को न भूलता और (इह) इस संसार में(तनु) उक्त सुख की इच्छा करता हुआ मैं (यामि) प्राप्त होता हूँ कि जिससे यह (उरुशंस)अत्यन्त प्रशंसनीय सूर्य्य हमको (बोधि) विदित होकर (नः) हम लोगों की (आयुः) उमर(मा) (प्रमोषीः) न नष्ट करे अर्थात् अच्छे प्रकार बढ़ावें।2।॥11॥

भावार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
इस मन्त्र में श्लेषालंकार है। मनुष्यों को वेदोक्त रीति से परमेश्वर और सूर्य को जानकर सुखों को प्राप्त होना चाहिये और किसी मनुष्य को परमेश्वर वा सूर्य विद्या का अनादर न करना चाहिये सर्वदा ईश्वर की आज्ञा का पालन और उसके रचे हुये जो कि सूर्यादिक पदार्थ हैं उनके गुणों को जानकर उनसे उपकार लेके अपनी उमर निरन्तर बढ़ानी चाहिये॥11॥

रामगोविन्द त्रिवेदी (सायण भाष्य के आधार पर)
11. मैं स्तोत्र से तुम्हारी स्तुति कर तुम्हारे पास वही परमायु माँगता हूँ। हव्य-द्वारा यजमान भी उसे ही पाने की प्रार्थना करता है। वरुण! तुम इस विषय में उदासीन न होकर ध्यान दो। तुम अनन्त जीवों के प्रार्थना-पात्र हो। मेरी आयु मत लो।

Ralph Thomas Hotchkin Griffith
11. I ask this of thee with my prayer adoring; thy worshipper craves this with his oblation. Varuna, stay thou here and be not angry; steal not our life from us, O thou Wide-Ruler. 

Translation of Griffith Re-edited  by Tormod Kinnes
I ask this of you with my prayer adoring; your worshipper craves this with his oblation. Varuna, stay you here and be not angry; steal not our life from us, you Wide-Ruler. [11]

H H Wilson (On the basis of Sayana)
11. Praising you with (devout) prayer, I implore you for that (life) which the institutor of the sacrifice solicits with oblations: Varuna, undisdainful, bestow a thought upon us: much-lauded, take not away our existence.
That (Life) – The text has ouly, L ask that; the Scholiast supplies life, tadayus. The addiaon might be disputed; but its propriety is confirmed by the concluding expression, ma na ayuh pramosib,2 do not take away our life.

ऋग्वेद 1.24.10

अमी य ऋक्षा निहितास उच्चा नक्तं ददृश्रे कुह चिद्दिवेयुः। अदब्धानि वरुणस्य व्रतानि विचाकशच्चन्द्रमा नक्तमेति॥10॥

पदपाठ — देवनागरी
अ॒मी इति॑। ये। ऋक्षाः॑। निऽहि॑तासः। उ॒च्चा। नक्त॑म्। ददृ॑श्रे। कुह॑। चि॒त्। दिवा॑। ई॒युः॒। अद॑ब्धानि। वरु॑णस्य। व्र॒तानि॑। वि॒ऽचाक॑शत्। च॒न्द्रमाः॑। नक्त॑म्। ए॒ति॒॥ 1.24.10

PADAPAATH — ROMAN
amī iti | ye | ṛkṣāḥ | ni-hitāsaḥ | uccā | naktam | dṛdaśre | kuha | cit | divā | īyuḥ | adabdhāni | varuṇasya | vratāni | vi-cākaśat | candramāḥ | naktam | eti

देवता —        वरुणः;       छन्द        त्रिष्टुप् ;       स्वर        धैवतः;      
ऋषि         शुनःशेप आजीगर्तिः  स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः

मन्त्रार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
हम पूछते हैं कि जो ये (अमी) प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष (ॠचाः) सूर्यचन्द्रतारकादि नक्षत्र लोक किसने (उच्चाः) ऊपर को ठहरे हुये (निहितासः) यथायोग्य अपनी-अपनी कक्षा में ठहराये हैं क्यों ये (नक्तम्) रात्रि में (ददृश्रे) देख पड़ते हैं और (दिवा) दिन में (कुहचित्) कहाँ (ईयुः) जाते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर- जो (वरुणस्य) परमेश्वर वा सूर्य के (अदब्धानि) हिंसारहित (व्रतानि) नियम वा कर्म हैं कि जिनसे ये ऊपर ठहरे हैं। (नक्तम्) रात्रि में (विचाकशत्) अच्छे प्रकार प्रकाशमान होते हैं। ये कहीं नहीं जाते न आते हैं किन्तु आकाश के बीच में रहते हैं। (चन्द्रमाः) चन्द्र आदि लोक (एति) अपनी-अपनी दृष्टि के सामने आते और दिन में सूर्य्य के प्रकाश वा किसी लोक की आड़ से नहीं दीखते हैं ये प्रश्नों के उत्तर हैं॥10॥

भावार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
इस मन्त्र में श्लेषालंकार है तथा इस मन्त्र के पहिले भाग से प्रश्न और पिछले भाग से उनका उत्तर जानना चाहिये कि जब कोई किसी से पूछे कि ये नक्षत्र लोक अर्थात् तारागण किसने बनाये और किसने धारण किये हैं और रात्रि में दीखते तथा दिन में कहाँ जाते हैं इनके उत्तर ये हैं कोई ये सब ईश्वर ने बनाये और धारण किये हैं इनमें आपही प्रकाश नहीं किन्तु सूर्य्य के ही प्रकाश से प्रकाशमान होते हैं और ये कहीं नहीं जाते किन्तु दिन में ढ़पे हुये दीखते नहीं और रात्रि में सूर्य की किरणों से प्रकाशमान होकर दीखते हैं ये सब धन्यवाद देने योग्य ईश्वर के ही कर्म हैं ऐसा सब सज्जनों को जानना चाहिये॥10॥

रामगोविन्द त्रिवेदी (सायण भाष्य के आधार पर)
10. ये जो सप्तर्षि नक्षत्र हैं, जो ऊपर आकाश में संस्थापित हैं और राशि आने पर दिखाई देते हैं, दिन में कहाँ चले जाते हैं? वरुणदेव की शक्ति अप्रतिहत है। उनकी आज्ञा से रात्रि में चन्द्रमा प्रकाशमान होते हैं।

Ralph Thomas Hotchkin Griffith
10. Whither by day depart the constellations that shine at night, set high in heaven above us? Varuna’s holy laws remain unweakened, and through the night the Moon moves on in splendor 

Translation of Griffith Re-edited  by Tormod Kinnes
Where by day depart the constellations that shine at night, set high in heaven above us? Varuna’s holy laws remain unweakened, and through the night the Moon moves on in splendor [10]

H H Wilson (On the basis of Sayana)
10. These constellations placed on high, which are visible by night, and go elsewhere by day, are the undisturbed holy acts of Varuna (and by his command) the moon moves resplendent by night.
Here again we have unusual functions ascribed’ to Varuna: the constellations, Rksah, may be either, it is said, the seven Rsis, Ursa Major, or the constellations generally. They and the moon are said to be the pious acts of Varuna (Varunasya vratani) because they shine by his command. Rosen detaches adabdhani vratani by inserting a verb- illasa sunt opea Varuna; but Sayana expressly terms the constellations the acts of Varuna in the form (or effect) of the appearance, etc., of the asterisms. Varunasya karmani naksatra-darsanadirupani.1.