भारतीय इतिहास की बिडम्बना

ईसाई मिशनरियों के जानने से बहुत पहले संसार ने वेदों के विषय में जान लिया था। यहां तक कि ईसा के जन्म से बहुत पहले मितन्नी और हित्ती राज्य जो वर्तमान तुर्की के अंतर्गत आते हैं, न केवल वैदिक जन को जानते थे बल्कि उनके देवतंत्र में गहन आस्था रखते थे। इतनी गहन कि दोनो राज्यों के बीच हुई संधि में इन्द्र, वरुण, मित्र और नासत्य देवताओं को साक्षी के रूप में रखा गया था। निसंदेह इस पुरातात्विक खोज ने जो ईसा से 1200 सालों से भी पहले एशिया माइनर (आधुनिक तुर्की) में वैदिक जन की उपस्थिति को दर्शाती थी यूरोपियन बाबुओं को अपनी मान्यताओं के पुनर्गठन के लिये बाध्य कर दिया। मानव जाति के लिये यह वह समय था जब न केवल इतिहास का निर्माण किया जा रहा था बल्कि उस पर अधिकार के लिये छीना झपटी भी हो रही थी। निसंदेह यह अतीत और इतिहास के लिये चरम कौतूहल का समय था।

संयोगों का मानव जीवन में और इतिहास में न भुलाया जा सकनेवाला स्थान होता है। एक के बाद एक पोपों की गलतियों और दुराग्रहों ने जब यूरोप में ईसाइयत की सत्ता की जड़ें हिला दीं तो ‘गॉड की भेड़ों’ (बाइबिल में अनुगामियों का यही चित्रण है।) को संसार में अन्यत्र जाने की इच्छा हुई। यह सामन्तों, पादरियों और जनसामान्य तीनों के हित में था इसलिये इसपर सहज ही आम राय बन गई। मिशनरी संसार के कोनो कोनों में फैल गये। उनके साथ व्यापारी थे। सदियों से यूरोप यूरोप से बाहर के संसार पर निर्भर था। कपड़ों के लिये, मसालों के लिये, धातुओं के लिये और हां, सभ्यता के लिये जिसका उल्लेख उसने कभी नहीं किया।

भारत तब भी यूरोप की चेतना में था। बोगाज कुई अभिलेखों ने तो मात्र एक कपटजाल का आवरण भर हटाया था। इसके बाद भी बहुत कुछ मिलना था। रहस्य की परतें धीरे धीरे खुलीं। लेकिन इतिहास की बिडम्बना देखिये कि जब समय ने स्वयं को अनावृत्त कर दिया, आंखों ने सच को देखने की ताब नहीं की और अपने आप को बंद कर लिया। इसके पीछे गांधारी की सतीत्व (या हताशा!) की सनक नहीं थी बल्कि प्रलोभन, धौंस और सत्ता की धमक थी। आंखों का यह तमाशा था बीसवीं सदी का, जबकि आंखें खोलनेवाले सच का रंगमंच सुदूर अतीत में छुपा था, समय की धूल के नीचे, विस्मृति की गहन गुफा में।

हम चार हजार साल पहले की धरती पर लौटते हैं, क्योंकि अब वह हमारे सामने है। चाहे उसे कोई देखे या न देखे। लेकिन यह वैसा संसार नहीं है जैसा हम आज देखते हैं। न ही वे लोग हैं जिन्हें आज हम अधिकार सम्पन्न देखते हैं। यह वह समय है जब यूरोप में न इतिहास है और न ही संस्कृति। यह धरती का वह समय है जब यूरोप हमें किसी जीवाश्म की तरह स्तब्ध, सुप्त अवस्था में दिखाई देता है। हलचल का स्थान है पश्चिम एशिया और अफ्रीका का सन्धि स्थल। हलचल करनेवाली सभ्यतायें हैं मिस्री, मितन्नी और हित्ती (हिट्‌टाइट)। यही वह समय है जिसने हमें हमारे इतिहास की हरण कर ली गई गरिमा वापस की।

ईसा से डेढ़ हजार वर्ष पहले अर्थात्‌ आज से साढ़े तीन हजार साल पहले मिस्र में रैमसेस द्वितीय का शासन था। इसी समय के आसपास यहूदियों ने मूसा के नेतृत्व में मिस्र से बहिर्गमन किया था। रैमसेस ने उस समय एक विशाल सेना लेकर अपेक्षाकृत एक छोटे साम्राज्य हित्तियों पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध की कहानी बहुत दिलचस्प है। न केवल विवरण में बल्कि उसके परवर्ती इतिहास पर प्रभाव में भी। रैमसेस की सेना बीस हजार जवानों की बड़ी सेना थी जबकि हित्ती राजा मुवुतल्ली द्वितीय अपने निकटवर्ती शासकों को साथ लेकर भी इतनी बड़ी सेना नहीं जुटा सका।

हमारे लिये इस झगड़े में दिलचस्पी के दो बड़े कारण हैं। एक तो यह युद्ध हो रहा था आज के सीरिया और लेबनान पर अधिकार के लिये क्योंकि इनसे होकर भारत के लिये रास्ता जाता था। यही वह मार्ग था जिससे मिस्र और अन्य सभ्यतायें भारत से व्यापार व आदान प्रदान करती थीं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस युद्ध का लिखित विवरण रखा गया जिसके अभिलेख पुरातत्वविदों द्वारा खोज लिये गये हैं। इन अभिलेखों से उस समय की भाषाओं को पढ़ने में पर्याप्त सहायता मिली। इसके दो महत्वपूर्ण परिणाम हुये। एक तो प्राचीन विश्व के भारत के साथ संबंध के विषय में लिखित प्रमाण मिले। दूसरे यूरोप के इतिहास में भारत की रहस्यमय उपस्थिति की जो गूंज सुनाई देती थी उसकी पुष्टि हुई।

वर्तमान लेबनान सीरिया की सीमा पर ऑर्नेट नदी के किनारे कदेश नाम का शहर था जहां यह अविस्मरणीय युद्ध हुआ था। युद्ध का समय था ईसा से 1275 वर्ष पूर्व और रोमनों के साम्राज्य के रूप में संगठित होने से भी लगभग बारह सौ साल पहले का है। यूरोप के इतिहास में यह समय अंधकार का काल कहा जाता है क्योंकि उस समय यूरोप में न कोई बड़ी गतिविधि दिखाई देती है और न ही कोई उल्लेखनीय मानवीय हलचल। जिस समय यूरोप में अंधकार था, दुनियां व्यापार और आवागमन की हलचल से भरी हुई थी। संस्कृतियां रूप ले रही थीं और सभ्यतायें जन्म ले रही थीं।

मिस्र और हिट्‌टाइट अपने समय के दो बड़े साम्राज्य थे। इस युद्ध के कारण दोनो का पतन हुआ। इस युद्ध में 5 से 6000 रथारोहियों ने हिस्सा लिया। युद्ध का यद्यपि कोई स्पष्ट निर्णय नहीं हुआ लेकिन अपनी रणनीतिक गलतियों के कारण रैमसेस को पीछे हटना पड़ा। दोनो साम्राज्य एक दूसरे के प्रति नरम पड़े। उनके मध्य संबंध बहाल हुये। जिसके कारण युद्ध के लगभग बीस सालों बाद एक संधि हुई। मानव इतिहास की यह पहली लिखित संधि है जिसके विवरण हमारे पास उपलब्ध हैं। आज संयुक्त राष्ट्र के कार्यालय में इस संधि के प्रारूप को उस समय की भाषा में ही प्रदर्शित करने के लिये महासभा के सचिव की आसंदी के ऊपर टांगा गया है। यह बताने के लिये कि राष्ट्रों के मध्य संधि की वास्तविकता कितनी गरिमामय व प्राचीन है और उसका सदा सम्मान किया जाना चाहिये।

इसी घटनाक्रम से जुड़ी एक और संधि का उल्लेख हमें मिलता है। यह संधि भी आज से साढ़े तीन हजार साल पहले मितन्नी और हित्ती राजाओं के बीच हुई थी। यह संधि हमारे अर्थात्‌ भारतीयों के उस समय के संसार से संबंध को प्रमाणित करती है। इस संधि में दोनो राजा हित्ती शासक सुपिलुलिमा और मितन्नी शासक शात्तिवाज वैदिक देवताओं क्रमशः इन्द्र, वरुण, मित्र और नासत्य(अश्विन) को संधि के साक्षी होने के लिये आमंत्रित करते हैं। ध्यान देने की बात यह है कि यह कोई साधारण अभिलेख नहीं है जिसकी उपस्थिति सांयोगिक या आकस्मिक हो अथवा जिसके वहां होने को किसी भ्रमणकारी व्यक्ति या समुदाय के छूट गये अवशेषों से जोड़ा जा सके। यह दो शासकों के मध्य संधि है जिसकी साक्षी वैदिक देवता दे रहे हैं। यह उक्त सभ्यताओं के उन देवताओं और प्रकारान्तर से वैदिक सभ्यता के प्रति आदर की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। इसे इसी रूप में देखे जाने की आवश्यकता है क्योंकि इससे इतिहास की कई त्रुटियों को सुधारा जा सकता है। पर हमारे लिये इससे जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है, आखिर वैदिक देवता भारत से हजारों मील दूर तुर्की तक कैसे पहुंचे?

बोगाजकुई जहां यह अभिलेख मिला है, तुर्की की राजधानी अंकारा से मात्र 150-200 किमी दूर है। तुर्की यूरोप और एशिया का संधिस्थल है। उस समय के विश्व में तुर्की, मिस्र, सीरिया, लेबनान, ईराक और ईरान मानव सभ्यता के प्रकाशित स्थल हैं। इतिहास में हम इनका उल्लेख हिट्‌टाइट, मितन्नी, अक्कादिन, असीरियन, मिस्री आदि साम्राज्यों के नाम से पढ़ते हैं। मेसोपोटामिया, बेबीलोन, एशिया माइनर वे नाम हैं जिनसे इतिहास की साधारण समझ रखनेवाला व्यक्ति भी परिचित हो जाता है। इन साम्राज्यों से निर्मित विश्व में यूरोप की उपस्थिति दिखाई नहीं देती। यह समय यूरोप के ज्ञात इतिहास में दाखिल होने से भी लगभग हजार साल पहले का है क्योंकि यूरोप का पहला ज्ञात शहर मार्सले फ्रांस में 600 ईसा पूर्व ही अस्तित्व में आया था। इतिहास के इस उद्‌घाटन ने यूरोप के साम्राज्यवादी अहं को पर्याप्त ठेस पहुंचाई जो कि उस समय अत्यधिक स्फीत अवस्था में था।

इस प्रश्न को समझने के लिये कि वैदिक देवता अपने मूल स्थान से इतनी दूर कैसे पहुंचे, हमारे लिये यह समीचीन होगा कि हम हित्ती और मितन्नी जन के बारे में और उपलब्ध कुछ अन्य साक्ष्यों का एक बार संक्षिप्त अवलोकन कर लें। महत्वपूर्ण यह भी है कि हित्ती साम्राज्य की अन्य शासकों से संधियों में वैदिक देवताओं की उपस्थिति नहीं है। ऐसा केवल मितन्नियों और उनके ही बीच घटित हुआ है। स्पष्टतः वैदिक देवता उनके ही साक्षी होंगे जो उनका आदर करें। ये शासक और उनका समाज वैदिक देवताओं का आदर करता होगा तभी संधि करते समय उनका यह विचार बना होगा कि भावी पीढ़ियां भी इस संधि का सम्मान करें इसके लिये आवश्यक है कि देवता हमारे वचन के साक्षी बनें। इसका यह सीधा निष्कर्ष है जिसे पाश्चात्य इतिहास लेखक झुठला नहीं पाते इसलिये उन्होंने इस पर रणनीतिक मौन धारण कर लिया है। ये दोनो साम्राज्य वैदिक सभ्यता के नियमित संपर्क में थे, ये सभ्यतायें भी। आज का ईरान तो पूरी तरह वैदिक रंग में रंगा था।

ईसा से लगभग 1600 वर्ष पूर्व एशिया माइनर में हित्ती जन दिखाई देते हैं। ये वहां पहुंचनेवाले नये लोग थे। लौह अयस्क को पिघलाकर लोहा बनानेवाले ये पहले लोग थे। हित्ती और वैदिक सभ्यताओं में अत्यधिक साम्य है। दोनो सभ्यतायें कृषि आधारित हैं। महिलाओं की उन्नत सामाजिक भागीदारी और शिल्पियों की उपस्थिति भी दोनो सभ्यताओं में समान है। पर सबसे विचित्र बात हित्ती सभ्यता में विधिक प्रावधानों की उदारता है। यह विशेषता हित्ती समाज की जहां वे थे उस स्थान से विलक्षणता दर्शाती है। इसके अतिरिक्त दंतकथाओं और आखयानों में भी सुदूर पूर्व से सम्बन्ध की ओर पर्याप्त संकेत निहित हैं। हित्तियों ने अपने साम्राज्य निर्माण के बावजूद स्थानीय निवासियों का दमन किया हो ऐसा उल्लेख नहीं मिलता। इसके विपरीत उन्होंने उदारता से अपने अधीनस्थ समुदायों की संस्कृति को भी आत्मसात कर लिया। यह अनुमान सत्य के बहुत अधिक निकट है कि हित्ती वास्तव में भारतीय मूल के लोग थे।

हित्ती शासकों के नामों की संस्कृत पहचान भी दृष्टव्य है। एक हित्ती शासक का नाम राम-सिन (सिन माने चन्द्र) रामचन्द्र था। एक और शासक का उल्लेख दुश्रुत या दशरथ के नाम से मिलता है। मिस्री राजा रैमसेस द्वितीय के एक मित्र हित्ती शासक का नाम रिमिशरिना के रूप में मिलता है। यह भारतीय नाम रामशरण के समरूप है। यह अलेप्पो का राजा था। हित्ती सभ्यता ईसा पूर्व उजड़ चुकी थी लेकिन हिब्रू बाइबिल में Genesis 23, Genesis 26:34, Exodus 13:5; Numbers 13:29; Joshua 11:3, 2 Samuel 11   आदि स्थानों पर उनके सम्बन्ध में उल्लेख मिलते हैं। इसका अर्थ है कि हित्तियों ने अपनी पहचान बनाये रखी और आगे चलकर यहूदी और ईसाई धर्मों को प्रभावित किया।

हित्तियों की अपेक्षा मितन्नियों की भारतीय पहचान अधिक स्पष्ट है। मितन्नी राजधानी का नाम वासकनी संस्कृत शब्द वसुखानी के समरूप है जिसका अर्थ धन की खान होता है। ऊपर वर्णित सन्धि मुद्रा के अतिरिक्त घोड़ों के प्रशिक्षण से सम्बन्धित एक अभिलेख भी उपलब्ध हुआ है। यह संसार का सबसे पुराना अश्व प्रशिक्षण मैनुअल है। 1345 ईसा पूर्व लिखित अभिलेख में 1080 पंक्तियां हैं। इसके मितन्नी लेखक का नाम किक्कुली अंकित है और यह किक्कुली मितन्नी का प्रधान अश्व प्रशिक्षक है इन शब्दों से शुरू होता है। इस अभिलेख की विशेषता इसमें अंकित संस्कृत शब्द हैं जिनकी पहचान स्पष्ट है। कुछ शब्द निम्नानुसार है; अस्सुस्सान संस्कृत शब्द अश्व-सानी अर्थात अश्व प्रशिक्षक, एका वर्तन्ना संस्कृत एक वर्तनम अर्थात एक मोड़, तेरा वर्तन्ना संस्कृत त्रि वर्तनम अर्थात तीन मोड़, इसी तरह संस्कृत पंच के लिये पंज, सप्त के लिये सत्त, नवम्‌ के लिये नव अंकित हैं। इतिहास की यूरोप केन्द्रित धारा इन अभिलेखों पर प्रायः रहस्यमय मौन धारण किये हुये है।

हित्तियों की तरह मितन्नी शासक भी उदार थे, बहुदेव वादी थे। एक और विशेषता इन शासकों के उदार कानून और दास प्रथा के प्रति अरुचि से प्रकट होती है। यह उनके पड़ोसिंयों की रीतियों से मेल न खानेवाली रीति थी। मिस्र में उस समय दास प्रथा का बोलबाला था। ये मितन्नी ही थे जिन्होंने मध्य पश्चिम एशिया में सबसे पहले आरेयुक्त पहियों वाले रथ को अपनाया। इससे पहले उनके पड़ोसी ठोस पहियों वाले रथ का उपयोग करते थे जो भारी और युद्ध के समय धीमा होता था। इनके अतिरिक्त इलेमाइट और कस्सी  भी थे। इन सामा्रज्यों का 500 ईसा पूर्व तक अर्थात्‌ बुद्ध के समय के आसपास तक भारतीय सीमा से यूरोपियन सीमा तक दबदबा रहा था।

भारतीयों के पश्चिम की ओर जाने का स्पष्ट संकेत बौधायन श्रोतसूत्र के 18वे अध्याय के 44 वे अनुच्छेद में मिलता है। उसमें कथित है कि अयु पूर्व की ओर गये। उनके उत्तराधिकारी हैं कुरु पांचाल और काशी विदेह। यह अयव है। अमावसु पश्चिम की ओर गये। उनके उत्तराधिकारी हैं गांधार, पर्सु और अरट्‌ट। ये अमावसु हैं।

अब हम पाठकों का ध्यान चार हजार वर्षों के अंतराल पर उपस्थित एक विचित्र साम्य की ओर आकर्षित करते हैं। क्या आप जानते हैं कि गांधी जी और हित्तियों में क्या समानता थी? हित्ती जो ईसा से दो हजार वर्ष पूर्व स्थित हैं और गांधी जी जो ईसा के दो हजार वर्ष बाद हुये हैं, दोनो ने एक विशेष विधिक सिद्धांत को अस्वीकार कर दिया था। विधि के इस सिद्धांत को प्रतिशोध का सिद्धांत कहते हैं। इसे आंख के बदले आंख के नाम से भी जाना जाता है। ज्ञात इतिहास में इसका सबसे पहला उपयोगकर्ता था हम्मूरबी।

हम्मूरबी बेबिलोनियन साम्राज्य का छटवां राजा था। इसने ईसा पूर्व 1894 से लगभग 30 सालों से अधिक तक मध्य मेसोपोटामिया (वर्तमान ईराक) पर शासन किया था। हम्मूरबी के विधिक सिद्धांत एक पत्थर पर उत्कीर्ण किये गये हैं।

सन 1901 में एक फ्रेन्च इंजीनियर जैकस डि मॉर्गन को सुसा की राजधानी इलेमिट में उत्खनन करते समय यह अभिलेख मिला था। यह स्थान वर्तमान ईरान में है जो शासक हम्मूरबी की राजधानी से दूर स्थित है। संभव है कि इसे इलेमिट राजा शुतुर्क नाहन्ट द्वारा 1200 ईसा पूर्व विजय के प्रतीक के रूप में बेबीलोन से ले जाया गया होगा। अभिलेख तीन टुकड़ों में बंटा हुआ था। इसे शीघ्र ही पढ़ लिया गया और विधि के लिखित रूप के सबसे प्राचीन रूप में प्रसिद्ध हो गया। कौतूहल का एक कारण यह भी था कि इस अभिलेख में वर्णित विधिक सिद्धांतों की हिब्रू में लिखित पुरानी बाइबिल (ओल्ड टेस्टामेंट) से काफी समानता थी।

हम्मूरबी का पाश्चात्य इतिहासकारों ने प्रथम विधि निर्माता के रूप में बहुत अधिक महिमामंडन किया है। यद्यपि इस अभिलेख से भी प्राचीन अभिलेख खोज लिये गये हैं लेकिन हम्मूरबी की लोकप्रियता आज भी बनी हुई है। अमेरिकी उच्चतम न्यायालय के दक्षिणी कक्ष में हम्मूरबी का मानव जाति के प्रथम विधि निर्माता के रूप में सम्मानपूर्वक उल्लेख अंकित किया गया है। तथापि अपनी प्रकृति में हम्मूरबी के विधिक सिद्धांत तामसिक, प्रतिहिंसक, प्रतिशोधपूर्ण और वैमनस्यकारी हैं। इसके बावजूद यदि उसे इतना सम्मान और लोकप्रियता मिली तो इसका कारण था उसके सिद्धांतों का रोमन विधि और ओल्ड टेस्टामेंट से मेल खाना। रोमन विधि में इसे lex talionis के नाम से जाना जाता था। ओल्ड टेस्टामेंट में एक्सोडस 21:23-27 में आंख के बदले आंख का सिद्धांत वर्णित है। विधि के इस सिद्धांत को अपनाये जाने के कारण ही हमें यूरोप और अरब में आज तक युद्ध, जनसंहार और बिखराव देखने को मिलता है। बिना दया और सुधार की अपेक्षा के अपनाई गई विधि अमानवीय तो है ही, उसके कभी अच्छे परिणाम देखने को नहीं मिले हैं।

हम्मूरबी के समय में ही हित्ती साम्राज्य की विधि का विकल्प था। सन 1907-08 में मैक्रिड बे और ह्‌यूगो विन्कलर द्वारा हित्ती विधि के 10,000 से अधिक अभिलेख खोज लिये गये थे। इन्हें सन 1910 से 1921 के बीच बेडरिच रॉनी द्वारा पढ़ लिया गया था। हम्मूरबी द्वारा प्रतिपादित विधि सिद्धांतों के विपरीत हित्ती विधि सुधार और करुणा पर अवलम्बित है। उसमें भय और दण्ड का कम से कम उपयोग किया गया है। लेकिन यूरोपीय इतिहासकार रोमन और ईसाई मानकों के अनुरूप ही पुराने इतिहास का आकलन करते रहे हैं, इसलिये ऐसी बातों के प्रति उनके मन में सम्मान न होना आश्चर्यजनक नहीं है।

प्राचीन सांस्कृतिक विश्व में वैदिक भारतीयों की उपस्थिति के प्रमाणों का अभी तक तर्कसंगत और विश्वसनीय आकलन नहीं किया गया है। इसके भू राजनैतिक कारण तो हैं हीं, भारत सरकार की अपने देश और समाज के प्रति अविश्वसनीय और अतार्किक धारणा भी इसके लिये उत्तरदायी है। न केवल भारत सरकार और भारत देश में स्पष्ट अलगाव दिखता है बल्कि भारतीय समाज की इस विषय में उदासीनता को भी अक्षम्य अपराध के रूप में देखा जाना चाहिये जो आरक्षण, नालियों और मंदिरों के लिये तो आंदोलन करता है लेकिन पीढ़ियों के हितों को प्रभावित करनेवाले विषयों को अनदेखा करता है।

बोगोजकुई अभिलेख ने इतिहास की धारा को यूरोप केन्द्रित अतिवाद के दलदल से निकाला। यही नहीं तिथि निर्धारण की मनमानी पर भी अंकुश लगा। मैक्समूलर जैसे बाबुओं और मिल, मैकाले जैसे घृणावादी, साम्राज्यवादी लेखकों ने इतिहास लेखन को प्रायः एक मनमाने खेल में बदल दिया था जिसमें साहबों की सनक ही प्रमाण हुआ करती थी। मैक्समूलर द्वारा वेदों के रचनाकाल का निर्धारण पाठकों को याद होगा जिस पर वह बाद में पलट गया था। मात्र एक हजार साल से भी कम समय में बाहर से आये हुये आक्रमणकारियों ने न केवल इतनी विपुल मात्रा में साहित्य का सृजन किया, एक भरी पूरी और वर्तमान यूरोप से भी अधिक क्षेत्रफल में फैली सभ्यता का विस्तार किया बल्कि एक से अधिक भाषायें बनाकर, निरंतर संघर्षरत रहते हुये एक ऐसा चमत्कार कर दिखाया था जिसे संसार भर से धन लूट कर, असंखय मानवों की हत्या करके भी यूरोपीय देश दोहरा नहीं पाये थे।

यह कितनी विचित्र बात है कि आज का भारत जिस आर्य और द्रविड़ पार्थक्य के कारण कलहग्रस्त है उसका कोई पुरातात्विक या भाषीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। यही नहीं जातिगत भेदभाव और अमानवीय व्यवहार के मूल में जिस वर्ण व्यवस्था पर दोषारोपण किया जाता है, उसका जाति व्यवस्था से प्रायः कोई संबंध ही नहीं है। लेकिन इस सत्य पर राजनैतिक स्वार्थ और घूसखोरी की संभावनाओं के दोहन के लिये टनों धूल डाल दी गई है। अतीत से प्राप्त होने वाली जानकारी का उपयोग बिना व्याखया के संभव नहीं है इसलिये लेखक देश और काल के विस्तार में फैले तथ्यों, घटनाओं, इतिवृत्तों का समन्वय करने का प्रयास करते हैं। इस प्रयास के पीछे निहित दृष्टि भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

इसी निहित दृष्टि ने मिल को भारत का इतिहास लिखने के लिये प्रेरित किया था। हत्या, विश्वासघात, लूट और बर्बर नीचता में संलिप्त अंग्रेजी साम्राज्यवाद के लिये अधीनस्थ भारतीयों को यह बताना आवश्यक हो गया था कि उनके पूर्वज भी क्रूर, बर्बर और असभ्य थे। उनमें चेतना नहीं थी। उनके और उनके वंशजों के जीवन का मूल्य अधिक नहीं था। स्वतंत्र और सभ्य होने की योग्यता से वंचित भारतीयों के लिये अंग्रेजी (लुटेरों) का शासन अवश्य ही सभ्य लगना चाहिये। मिल का यह प्रत्यक्ष घृणावाद उस समय भारतीय विद्यालयों में पढ़ाया जाता था।

हमारी पाठ्‌यपुस्तकों में अंग्रेजी लेखकों की धूर्तता का प्रायः कोई विवरण उपलब्ध नहीं होता। न ही हमें यह बताया जाता है कि किस प्रकार घूसखोरी और लूट के लिये ब्रिटिश मध्यवर्ग के युवा भारत पहुंचने के लिये जी जान लगाये रहते थे। आज जब हम सरकारी नौकरी के लिये अपने युवाओं को जान लड़ाते देखते हैं तो इस बात को अनदेखा कर देते हैं कि हराम के धन का लालच हमारे समाज को अपने निकट अतीत से मिला हैं जहां लूट और हत्याओं से धन अर्जित करने के लिये भद्र और अभिजात परिवारों के युवा यहां आते थे और समृद्ध होकर लौटते थे। यह वही अतीत है जो हमारे युवाओं की छीना झपटी में प्रतिबिम्बित होता है और जिससे हमें प्रयासपूर्वक दूर रखा जाता है।

मध्य पश्चिम एशिया के इतिहास के अभिलेख अठारहवीं सदी के अंतिम दौर में ही उपलब्ध होने लगे थे। उससे पहले बहुत पहले से यूरोप का बौद्धिक वर्ग अपने अतीत के प्रति उत्सुक होने लगा था। उसके पास जो साहित्य था वह भी धार्मिक ही अधिक था किंतु उसमें सुदूर अतीत के प्रति उलझन भरे संकेत थे। जब इन संकेतों का अनुसरण किया गया तो समस्याओं का पिटारा ही खुल गया। इनमें सबसे बड़ी समस्या थी अतीत में यूरोप की अनुपस्थिति। यूरोप के इतिहास को अधिक से अधिक रोमन ग्रीक सभ्यता तक पीछे देखा जा सकता था। यह भी ईसा से दो या तीन सौ वर्ष से अधिक पीछे नहीं जाता। ऐसी स्थिति में एक महत्वहीन इतिहास का लेखन करना न केवल पहचान के लिये कष्टप्रद था बल्कि उसमें सार्थकता की बहुत कम संभावना थी।

यूरोप के लेखकों की यह चिंता उनके द्वारा प्रथमतः अपनाये गये अनुरूपांतरण या पूर्वगामी संयोजन (retrofit theory) द्वारा व्यक्त होती है। ईसा के पहले मिलने वाले ऐतिहासिक तथ्यों के लिये उनका यह प्रयास रहा कि उन्हें कम से कम समय में समेटा जाये अन्यथा धार्मिक साहित्य में व्यक्त कालमर्यादा का उल्लंघन होता है। इसके अतिरिक्त वे जो काम कर रहे थे उसमें उनकी तात्कालिक और व्यावसायिक आवश्यकताएं अधिक प्रभावी थीं। वर्तमान में वे विजेता थे। उनका अधिक विरोध नहीं था। इसलिये उन्होंने बिना सत्य और औचित्य की परवाह किये एक विचित्र इतिहास का निर्माण कर दिया जिसमें घटनायें बहुत तेजी से घट रही थीं। बहुत बड़े सामाजिक परिवर्तन, भाषाओं का निर्माण, सभ्यताओं का उत्थान, पतन, व्यापक प्रसार वाले क्षेत्रों से सम्बद्ध साहित्य का सृजन सब अल्पकाल में ही घट जाता था। ऐसा लगता था कि इतिहास एक हलचल भरा रंगमंच हो जिसके वे निर्देशक हों।

समस्या तब और अधिक गंभीर हो गई जब यह सब इतिहास की राजनीति में बदल गया। इतिहास की व्याखयाओं ने राजनैतिक आवश्कताओं की पूर्ति करना शुरू कर दिया। इन आवश्यकताओं में साम्राज्यवादी लूटखसोट सबसे बड़ा उद्‌देश्य था। इसके अतिरिक्त राजनैतिक विचारधाराओं का विस्तार भी एक समस्या के रूप में हमारे सामने आया। यहां तक कि धर्म मीमांसाओं के राजनैतिक रूप भी सामने आये। इन सबका एक ही आग्रह है इतिहास के ऐसे रूप को सामने लाना जो उनके स्वार्थों की पूर्ति कर सके और उनके अपराधों को ढंक सके।

यूरोप में औद्यागिक क्रान्ति और लूट के धन के संग्रह ने कई सुविधाजनक स्थितियां उत्पन्न कर दीं। इसलिये उनके सामने तथ्यों के विश्लेषण की चुनौती नहीं है। साम्राज्यवादी व्याखयायें और संरचनायें आज भी उनके लिये काम कर रही हैं। लेकिन एशिया, अफ्रीका के समाज आज भी बिखराव, अंधधार्मिक चेतना और राष्ट्रवादी विरोधी उन्माद से जूझ रहे हैं। उनके बुद्धिजीवी आज भी अपने समाज के लिये और अपनी भाषाओं में काम नहीं करते हैं। यहां तक कि लेखन से जुड़े धनलाभ और पदलाभ की लालसा ने उन्हें अपने ही समाज में साम्राज्यवाद का मुखबिर बना दिया है। कम्यूनिस्ट अतिवाद ने भौगोलिक विचारधारा के रूप में धर्म का प्रतिरूप तैयार कर लिया है जिसमें किसी व्यक्ति की अपने समाज और देश के प्रति लगाव की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है। यही कारण है कि हमारे सामने ऐसे बौद्धिक व्यापार हैं जो देख कर भी नहीं देखते, सुनकर भी नहीं सुनते। यहां तक कि हमारी वैज्ञानिक उपलब्धियां हमारे काम नहीं आती। इतिहास की ट्रेन में देर से बैठने का परिणाम हम भुगत रहे हैं। इसके अब हाथ से छूटने की संभावना प्रबलतर हो उठी है। इतिहास मानव चेतना का निर्माता है। वर्तमान का विस्तार अधिक नहीं होता। हमारे सामयिक जीवन का प्रसार हमारी चेतना तक नहीं पहुंच पाता है क्योंकि उसमें अर्थ का निर्माण नहीं होता। हमारे विचार, विश्वास और आग्रह जब तक समय की कसौटी पर नहीं कसे जाते तब तक उनकी सार्थकता और औचित्य संदिग्ध ही रहती है। अतीत को इस रूप में ग्रहण करना कि वे मनुष्य के संगठित होने, शिक्षित होने और सभ्य होने को संभव बनाये एकमात्र रास्ता होना चाहिये। हर समाज और हर व्यक्ति अपने समय के लिये काम करता है। पर समय का प्रवाह भविष्य की ओर होता है। इसलिये बीते हुये का सार वर्तमान से भविष्य को अंतरित हो जाता है। इस सार में से किसे क्या चुनना है, क्या ग्रहण करना है? इसके लिये जिस बुद्धि, विवेक की आवश्यकता होती है, इतिहास उसी का निर्माण करता है। ऐसा नहीं कि युद्ध एवं संघर्ष केवल धन, सत्ता और भूमि के लिये ही होते हों। मानव का स्वत्व जिसमें भी निहित है उन सबके लिये छीना झपटी और संघर्ष होता है चाहे वह विज्ञान हो, शिक्षा हो, साहित्य हो अथवा संस्कृति के तत्व हों। छीना झपटी के ये रूप जिन दांवपेंचों में अभिव्यक्त होते हैं उन्हें ही राजनीति कहा जाता है। यह इतिहास में भी होता है। उसे ही हम इतिहास की राजनीति कहते हैं।

– संजीव कुमार

वेदों को समझना

कल्पना करते हैं। कल्पना में सुख है।

आपके पास दस हजार जीण शीर्ण पन्ने हैं। इतने जीर्ण शीर्ण कि थोड़ी सी भी असावधानी से फट सकते हैं या अनुपयोगी हो सकते हैं। प्रत्येक पन्ने पर कुछ पंक्तियां लिखी हुईं हैं। इन्हीं में से किसी अथवा किन्हीं पन्नो पर किसी बड़े खजाने के विषय में कुछ संकेत सूत्र भी हैं। आप एक बार में इनके अर्थ का निश्चय नहीं कर सकते क्योंकि उसमें अंकित जानकारी के साथ कुछ शर्ते हैं जो इन पन्नों से बाहर किसी मान लीजिये आपके घर से थोड़ी दूर स्थित किसी जंगल में कहीं अंकित कुछ संकेतों के मिलान से पूरी होती हैं। इन संकेतों के मिलान के बाद पन्नों पर लिखी जानकारी का अर्थ भी बदल सकता है।

दस हजार जीर्ण शीर्ण पन्नों का रख रखाव आपके लिये बहुत कठिन और खर्चीला हो सकता है। लेकिन यह यहां कल्पना का विषय है। इसलिये आप कम से कम इससे तो बचे हुये हैं। लेकिन आपको यदि बार बार जंगल तक जाकर चाहे वह आपके घर से कितना ही पास क्यों न हो, इन संकेतों को पढ़कर आना पड़े और उसके बाद इन पन्नों का नये सिरे से अनुसंधान करना पड़े तो आप क्या सोचते हैं? इसमें कितना समय लग सकता है? खजाना आपको स्वयं से कितना दूर लग रहा है? हमें तो लगता है मोटे से मोटा अनुमान भी आपको आपके जीवनकाल की अवधि से बाहर ले जायेगा। यह संभव नहीं लगता कि आप अपने जीवन में इस खजाने को पा सकेंगे!

फिर क्या करें? कल्पना के धन का एक बार फिर उपयोग किया जा सकता है। इस बार आप अपने साथ दो विश्वस्त व्यक्ति चुन लीजिये। वे आपके सेवक हो सकते हैं या आप उन्हें अपना हिस्सेदार बना सकते हैं। जो भी हों, वे आपके निर्देशों का पालन करते हुये जंगल तक जायेंगे और आपके लिये उन संकेतों, दिशा निर्देशों को लेकर आयेंगे जिनसे आप खजाने के लिये लिखी इबारत की गूढ़ता में आवश्यक अर्थ की खोज कर सकते हैं। इससे आप का काफी समय बचेगा। आप इस बचे हुये समय का कुछ अन्य उपयोग कर सकते हैं। आप इन जीर्ण पन्नों की अच्छे कागजों पर दूसरी प्रति बना सकते हैं। इन पन्नों के लिये कोई सारणी बना सकते हैं जिससे आने वाले संकेतों के अनुरूप या संगत पन्ने को शीघ्रता से खोजा जा सके। आप अभी तक प्राप्त संकेतों को सिलसिलेबार उपयोग करने लायक कोई अन्य तरीका खोज सकते हैं। तब भी आपके पास समय की कमी की समस्या बनी ही रहेगी। क्यों भला?

दस हजार पन्ने यदि जीर्ण शीर्ण न भी हों तब भी एक बड़ी समस्या हैं। उन्हें आप एक अलमारी में या एक बड़े कमरे में शायद ही रख पायें। जीर्ण शीर्ण होने के कारण आपको उन्हें कई बक्सों में और उन बक्सों को कई कमरों में रखना पड़ सकता है। उनके हाथ लगाते ही फट जाने का डर है इसलिये उनका उपयोग और भंडारण करते समय आपको अपनी गति बहुत अधिक धीमी रखने की आवश्यकता है जिससे आपकी सावधानी की चेतना बनी रहे। आपको बार बार उनके निरीक्षण करते रहने, उनकी स्थिति को जांचने परखने की आवश्यकता है जिससे यदि कोई पन्ना नष्टप्राय हो तो आप समय रहते उसकी प्रतिलिपि तैयार कर लें। दुर्भाग्यवश आपके पास उपलब्ध खाली पन्नों की गुणवत्ता भी ठीक नहीं है। इसलिये आपके पास संभवतः बैठकर सुस्ताने के लिये या अपना पेट पालने के लिये धनार्जन करने के लिये भी समय मिलना संभव नहीं लगता। खजाना एक बार फिर आपसे दूर जाता लग रहा है।

मानव जाति के लिये खजाने का आकर्षण आदि काल से ही बड़ा रहा है। संभव है आप इसमें कुछ समय और लगाना चाहें। खजाने की राशि का बड़ा होना आपको कुछ और देर तक ललचा सकता है। लेकिन परिस्थिति निरंतर दुष्कर, तनावप्रद और कठिन होती जा रही है। आपके पास नष्ट, संरक्षित और प्रतिलिपि करने योग्य पन्नों का ढेर बढ़ता जा रहा है। इसके साथ ही उन मंतव्यों, निर्देशों और खोजों का भी जो आप तक आने वाले संकेतों के कारण आपके पास जमा हो रही हैं। अब ऐसे में आपके सहयोगी आपसे किसी सूचना की मांग करने लगें या किसी पन्ने पर लिखी इबारत पढ़कर सुनाने का आग्रह करने लगें जिसे आपको खोजना पड़ेगा या किसी बक्से में से निकालकर देखना पड़ेगा। तब!

नहीं अब और नहीं। यह कल्पना किसी भी दृष्टि से सुखद नहीं है। आप देख रहे हैं और बहुत समय से देख रहे हैं कि आपके चारो ओर बढ़ती अस्तव्यस्तता, अनिश्चितता आपको कमजोर कर रही है। आपकी थकान बढ़ रही है और जीवनशक्ति टूट रही है। खजाना चाहे कितना ही क्यों न बढ़ा दिया जाये लेकिन आपके मन में अब उसके लिये कोई आकर्षण शेष नहीं है। बल्कि आप तो यह चाहते हैं कि आपके पास जो कुछ भी है वह सब ले लिया जाये और आपको इस संभावित खजाने की खोज के भार से मुक्त कर दिया जाये। आप मुक्त होना चाहते हैं। आप मुक्त हो जायें, जो कुछ फल मूल जहां तहां लगे मिलें उन्हें खाकर अपनी पेट की आग बुझायें और अपने परिवार जो यदि अब तक बचा रहा गया हो तो उसकी ओर देखें। इतना सुख ही बहुत है।

चलिये इस बार कल्पना को थोड़ा सरल कर लेते हैं।

आपके घर के पास एक जंगल है। एक दिन आप सपना देखते हैं कि आपके पास किसी दैवीय शक्ति की ओर से एक बड़ा लेखक या विचारक बनने का अवसर आता है। आपको बस इतना करना है कि जागकर उस निकटवर्ती जंगल में जाना है। वहां कुछ हजार पेड़ों पर, जी हां, कुछ हजार, कुछ लिखा हुआ है। हर पेड़ पर कुछ पंक्तियां हैं। उन पंक्तियों में सारगर्भित सूक्तियां हैं। लेकिन उनके क्रम का कोई संकेत नहीं है। इस कल्पना में भी बस इतनी समस्या है कि आपको उनका संचय कर उन्हें किसी उपयोगी क्रम में रखना है। उन्हें समझना है। यदि वे गूढ़ हैं तो उन पर अपनी समझ का विवरण लिख देना है। तभी न वे किसी और को समझ आयेगीं। दुर्भाग्यवश एक समस्या और है। उन्हें अंकित करने के लिये दैवीय सत्ता द्वारा जो कागज उपलब्ध कराये गये हैं वे कुछ छोटे आकार के हैं, उन पर दोनो ओर नहीं लिखा जा सकता है और उन्हें सिलना भी शायद संभव नहीं है। इसके अतिरिक्त उन कागजों का जीवन बहुत छोटा है और वे अच्छी गुणवत्ता के भी नहीं हैं। इसलिये आपको बार बार उनकी प्रति बनानी पड़ती है तथा बार बार जंगल तक भी जाना पड़ सकता है। क्योंकि कई बार आपके लिखे हुये कागज पढ़ने लायक नहीं रह जाते हैं।

 कुछ हजार संकेतों को कुछ हजार कागजों में लिखकर कुछ संदूकों में आप बंद तो कर लेते हैं। लेकिन इससे आप बड़े लेखक नहीं बन गये हैं। बड़े लेखक आप तब बनेंगे जब आपके पड़ोसी, नगरवासी और प्रान्तवासी आपके पास संचित ज्ञानराशि का लोहा मानेंगे। इसके लिये आपको अपनी ज्ञानराशि का रख रखाव ठीक से करना पड़ेगा और उसे अधिक उपयोगी स्थिति में लाना पड़ेगा। संतोष की बात है कि लोगों को आपने बताया तो उन्होने आपका विश्वास भी कर लिया। वे आये भी और उन्होने आपका प्रवचन सुना भी। उन्हें अच्छा भी लगा। आपको यश भी मिला और आदर भी। क्या अब आप संतुष्ट हैं। नहीं। यह ज्ञान जीवन के लिये अपरिहार्य नहीं है इसलिये इसके प्रतिफल में आपको जो कुछ मिला उससे जीवन यापन संभव नहीं लगता।

आप पहले ही हजारों पेड़ों पर अंकित ज्ञान का संचय करने में बहुत अधिक समय नष्ट कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त आपको उन संदेशों का रख रखाव भी करना पड़ रहा है। लोग किसी भी समय आपके पास आते हैं और आपकी सराहना करते हुये आपसे किसी विशेष संदेश को सुनाने की मांग करते हैं। आप स्वयं को कोसते हुये संदूक दर संदूक छानबीन करते हैं और वांछित संदेश सुनाने बैठ जाते हैं।

इस प्रकार के जीवन का आनंद आप कुछ समय तक ही उठा सकते हैं। इसके बाद आपको किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों की खोज करनी पड़ेगी जो आपके परिवार का बोझ उठा सके। एक बार फिर दुर्भाग्य यह कि इस कल्पना में आधुनिक समय में संभव धनसंचय के साधनों का कोई उल्लेख नहीं है। इसलिये आपको मुद्रायें नहीं वस्तुयें ही मिलेंगीं। वे भी आपका भार बढ़ा सकती हैं।

आपने अनुभव किया कि ये या इस प्रकार की कल्पनायें वास्तव में तनावप्रद और दुखद हैं। इन कल्पनाओं के प्रतिफल के रूप में कल्पित कोई भी संभावना आश्वस्त करनेवाली नहीं है। लेकिन इसमें बीतने वाला जीवन व्यस्तता और तनाव से भरा है। अब हम वास्तविकता के संसार से किसी प्राचीन समय की ओर चलते हैं। यह संसार हमारे किसी भी अनुमान से अधिक साधनहीन, अनिश्चितता से भरा और नियम रहित है। इस संसार में भी हमारी जानकारी के अनुसार सुख और लूट खसोट की संपदा से भरे, परजीवी जन रहते हैं। ये ब्राह्‌मण हैं।

इन ब्राह्‌मणों के विषय में हमें बहुत अधिक जानकारियां मिल चुकी हैं। ये उपजीवी अर्थात्‌ दूसरों के उत्पादन को हड़पकर जीवित रहने वाले लोग थे। उनका ज्ञान झूठा था। उन्होंने समाज के बड़े हिस्से को दुख, दासता और अंधेरे में धकेल दिया। उन्होंने लोगों की बुद्धि पर अधिकार कर लिया जिस कारण से उन्होंने दुखी जीवन से विद्रोह नहीं किया। वे निरंतर षडयंत्र करते रहते थे। वे संगठित थे और पीढ़ियों तक संगठित रहे। शायद आज भी वे हैं और उसी तरह व्यापक जनता के विरुद्ध संगठित हैं। उन्होंने ऐसी धार्मिक विधियों की रचना की जो अमानवीय थीं। और ऐसी हीं न जाने कितनी बातें।

अब हम उस विषय वस्तु की ओर आते हैं जिसकी इन ब्राह्‌मणों ने रचना की। ये शास्त्र हैं, काव्य हैं, दर्शन हैं और वेद हैं। हमने जानबूझकर वेद को अंत में रखा है यद्यपि सभी इस तथ्य को जानते हैं कि वेद से ही यह सब प्रारंभ होता है। इसका कारण यह है कि हम अपनी ओर से चलते हुये वेद तक पहुंचे है। बाद में आने वालीं रचनायें बीच की कड़ियां हैं जिन्हें भुलाया नहीं जाना चाहिये। अब हम फिर शुरू से शुरू करेंगे। और उसको अपनी शुरुआती कल्पनाओं से जोड़कर देखेगें।

वेद हमारे संसार की सबसे आदिम रचना हैं। वे हमारे सामने उपलब्ध हैं। वैदिक साहित्य में चारों वेदों के अतिरिक्त भी बहुत सी सामग्री है जो उपलब्ध है। प्रायः प्रत्येक भारतीय वेदों के विषय में कुछ न कुछ जानता है चाहे वह किसी भी धर्म का अनुयायी हो। लेकिन वेद हमारी रुचि का विषय नहीं हैं। हम हजारों साल पहले के अपने पुरखों द्वारा छोड़ी गई विशाल पाठ्‌यसामग्री की विशालता का भी अनुभव नहीं कर सकते। हिंदू उन्हें अपना धर्मग्रन्थ मानते हैं। लेकिन शायद ही आप किसी हिन्दू को इस बात के लिये उत्सुक पायें कि वेदों में आखिर क्या है?

वैदिक साहित्य की विशालता चकित कर देने वाली है। लेकिन उससे भी अधिक चकित कर देने वाली है उनके प्रति उदासीनता और उन पर लगाये जाने वाले आक्षेप। उससे भी अधिक चकित कर देने वाली बात है उस पर की जानेवाली बातचीत की मात्रा। यदि वेदों में कथित मंतव्य इतना ही बुरा है तो उसपर इतनी अधिक चर्चा क्यों? उसे भुला क्यों नहीं दिया जाता?

यदि हम बहुत थोड़ी मात्रा में भी उत्सुक हो जायें तो हमें चकित कर देने वाली बातें बहुत हैं। हमारी परंपरा का बहुत बड़ा हिस्सा वेदों को हीन बातों से भरा हुआ और निरर्थक कहता है। इसके बावजूद दूसरी सांस में बड़े गर्व से घोषणा करता है कि उसकी मान्यतायें वेदसम्मत हैं। उनके लिये ऐसी क्या बाध्यता है कि वे स्वयं को वेदों से जोड़ें?

यदि आज के हिंदू धर्म की ओर देखें तो उसके पूरे ढांचे और रीति रिवाजों में शायद ही ऐसा कुछ बचा हो जिसे वैदिक कहा जा सके। इसके विपरीत मंदिर, उत्सव और सामुदायिक विघटन का कोई उल्लेख हमें वेदों में नहीं मिलता। मनुष्यों के वर्णों में विभाजन के उल्लेख को प्रायः जाति प्रथा से जोड़ दिया जाता है लेकिन दोनो व्यवस्थाओं में किसी संबंध को सिद्ध कर पाना कठिन ही रहा है। हमारे बहुत समय से चले आ रहे धार्मिक संप्रदाय वेदोक्त मान्यताओं के विपरीत सिद्धान्तों को मानने वाले हैं, लेकिन इसके बावजूद वे वेदों से स्वयं को दूर नहीं दिखाना चाहते। हम ही वैदिक हैं ऐसा उनका आग्रह रहता है।

विचित्र यह भी लगता है कि हजारों साल पुराने इस साहित्य की भाषा आज भी हमारी भाषाओं के रूप और स्वभाव को बनाती है। हम हजारों ऐसे शब्दों का अपने दैनिक जीवन में प्रयोग करते हैं जो विशाल वैदिक साहित्य में प्रायः उसी अर्थ में प्रयुक्त हुये हैं। समय के इतने अंतराल पर शब्दों के इतनी भारी मात्रा में अतिजीवन का धरती पर कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। यदि हम सहृदय हों तो हम सहजता से यह अनुभव कर सकते हैं कि हमारे पुरखे आज भी हमारे गले से बोल रहे हैं। हमारी कविताओं में घूम फिर रहे हैं। हमारी कहानियों और उत्सवों में अपनी सत्ता और सत्व के साथ उपस्थित हैं, भले ही हम उनका तिरस्कार करें, उनकी ओर से उदासीन रहें, हम उन्हें स्वयं से अलगा नहीं सकते। यह बात हर भारतीय के लिये सत्य है चाहे वह हिंदू हो, मुसलमान हो, ईसाई हो या किसी भी जाति का हो। चाहे वह बांग्लादेश में रहता हो, पाकिस्तान में या मारीशस में।

वेदों की विलक्षणता के कई उदाहरण दिये जा सकते हैं। यहां हम ऐसे ही एक प्रसंग का उल्लेख कर रहे हैं। प्रसंग इस प्रकार है,

जब ॠषि इस लोक से जाने लगे तब मनुष्य देवों से पूछने लगे कि हमारे लिये अब कौन ॠषि होगा? उन मनुष्यों के लिये देवों ने मंत्रों के अर्थ करने के विचार साधन से युक्त तर्क को ॠषि के रूप में दिया। अर्थात ॠषियों की अनुपस्थिति में युक्तियुक्त तर्क ही मनुष्यों के लिये ॠषि है। (निरुक्त 13/12) मनुस्मृति के 12 वे अध्याय के 106वे श्लोक में भी इसी धारणा को दोहराया गया है।

किसी अन्य धर्मग्रन्थ के विषय में ऐसी धारणा नहीं मिलती। सामान्यतः विश्वास करना विशेष रूप से अपने धर्मग्रन्थ में वर्णित बातों पर बिना कोई शंका या विचार किये विश्वास करना ही धर्म माना गया है। लेकिन वैदिक धर्म तर्क और विवेक का उपयोग करने पर बल देता है। ॠग्वेद में तो ईश्वर तक के विषय में साफ कह दिया गया है कि वह है भी कि नहीं इसे कोई नहीं जानता। यह विलक्षणता साधारण नहीं है।

ऊपर हमने वैदिक साहित्य की विशालता का उल्लेख किया है। चारों वेदों में 20379 मंत्र हैं। ये लगभग चार हजार से अधिक मुद्रित पृष्ठ होते हैं। हाथ से लिखने पर इनकी पृष्ठ संखया और अधिक बढ़ जायेगी। इन्हें ही यदि ताड़पत्र या भोजपत्र पर लिखा जाये तो यह पृष्ठ संखया दस हजार तक पहुंच सकती है। दस हजार ताड़पत्रों को सम्हालना सरल काम नहीं है। उन्हें पढ़ना, उनका रख रखाव करना और जीर्ण पत्रों को बदल कर उनकी प्रति को यथास्थान क्रमबद्ध करना भी किसी एक मनुष्य के वश की बात नहीं है। इसके अतिरिक्त वेदांगों में संकलित सामग्री को यदि इसमें जोड़ दिया जाये तो यह संखया पचास हजार या उससे भी अधिक पृष्ठों तक पहुंच सकती है।

आज के समय में हम इस पृष्ठ संख्या को कुछ जिल्दों में बांधकर एक अलमारी में रख सकते हैं। शीघ्रता से पृष्ठ पलटकर संबंधित स्थान तक पहुंच सकते हैं। एक पृष्ठ खराब हो जाने पर पूरी पुस्तक ही बदल सकते हैं। साधारण ढंग से रख रखाव करने पर भी आज की पुस्तक बीस से अधिक वर्षों तक उपयोग करने योग्य बनी रहती है। लेकिन हमारे पुरखों को यह सब सुविधायें उपलब्ध नहीं थी। उनके सामने विषम परिस्थिति थीं। उन्हें बस इस आस्था का संबल रहता था कि वे आने वाली पीढ़ियों के हितार्थ, धर्म के निमित्त या ईश्वरीय उद्‌देश्य की पूर्ति में दुख उठा रहे हैं। उनके अपने समय में भी उनकी पीड़ा को बांटने वाला कोई नहीं था। उनके अनुभवों में यह दुख बार बार व्यक्त होता है।

हमारे समय में यह एक झूठा विश्वास है कि जाति व्यवस्था अनंत समय से परिवारों को ठीक इसी क्रम में बनाये हुये है। जो आज स्वयं को ब्राह्‌मण कह लेते हैं, उनके पूर्वज सदा से ब्राह्‌मण ही थे। जो आज ब्राह्‌मण नहीं हैं उनके पुरखे कभी ब्राह्‌मण नहीं थे। इस झूठ को हम अपने समय के इतिहास के सामान्य ज्ञान से ही पकड़ सकते हैं। इसके अतिरिक्त जो आज ब्राह्‌मण हैं वे वास्तविक ब्राह्‌मणों की दृष्टि से किसी काल में ब्राह्‌मण होने के पात्र नहीं हो सकते। आज के युग में वेदो का जानकार होना संभव है किंतु ब्राह्‌मण होना असंभव है। इस सच को और यह सच किस प्रकार हमें प्रभावित करता है इस पर हम फिर विचार करेंगे, हमें तो अभी उन ब्राह्‌मणों के विषय में विचार करेंगे जो अब लुप्त हो गये हैं।

ऊपर हमने आपको दो प्रकार की कल्पनाओं में भाग लेने के लिये आमंत्रित किया था। उन कल्पनाओं की आरंभिक सरलता और उनके निर्वाह की कठिनाई पर एक बार फिर विचार करें। कल्पना के इस जगत में थोड़ी दूर ही चलने पर आप चलने और न चलने की एक दुविधा में फंस जाते हैं। इस दुविधा में जीवन की पीड़ा है। यह पीड़ा यदि आप अनुभव कर सके तो आप अपने पूर्वजों की पीड़ा को ठीक ढंग से समझ सकेंगे। किस प्रकार उन ब्राह्‌मणों को दुख, कठिनाई और त्याग से भरा जीवन बिताना पड़ता रहा होगा?

उस समय की कठिनाई को समझने के लिये हमने आपको विशेष ढंग से कल्पना करने के लिये कहा था। समझने का यह ढंग साहित्य से संबंधित है। साहित्य में हम अपने सम्मुख लेखक द्वारा रखी गई कथा या कल्पना से तादात्म्य करते हैं। तादात्म्य का अर्थ बहुत कुछ परकाया प्रवेश जैसा है अर्थात किसी अन्य की पीड़ा या सुख की अनुभूति करने के लिये उसके शरीर में प्रवेश करना। साहित्य हमारे सामने एक काल्पनिक संसार की रचना करता है। पाठक उसके साथ स्वयं को इस प्रकार जोड़ता है कि वह अपनी स्थिति को भूल जाये और उपस्थिति रचना के पात्रों और उनके संसार में पहुंच जाये। सभी पाठक ऐसा नहीं कर सकते। स्वयं को भुलाना आसान नहीं होता। इसके लिये संवेदनशीलता की आवश्यकता पड़ती है। सौभाग्यवश हमारे पास कल्पना करने, तादात्म्य करने और अनुभूत करने की विशेष मनोवैज्ञानिक शक्तियां हैं जिनके द्वारा हम जीवन के विस्तृत रूप का उपभोग कर सकते हैं। निसंदेह अधिक संवेदशीलत पाठक अधिक तादात्म्य कर पाते हैं किंतु अभ्यास से संवेदनशीलता को भी बढ़ाया जा सकता है। अभ्यास से आप साधारण से विशेष अर्थात सहृदय बन सकते हैं। इससे आपकी चेतना का विस्तार होता है और आप अधिक सजग, अधिक चैतन्य और अधिक सक्षम मनुष्य बनते हैं।

 यदि आपको अपने पूर्वजों को ठीक से समझना है तो आपको इन्हीं मानसिक शक्तियों से समझना पड़ेगा। तभी आप उनके प्रयासों की महत्ता को समझ सकेंगे। तभी आप जान सकें कि क्यों भारत से दासों का व्यापार नहीं हुआ। क्यों भारत में सामाजिक विद्रोहों और अशान्ति की सूचना लंबे इतिहास में कभी नहीं मिलती। क्यों भारतीयों के बाहर आक्रमणकारी के रूप में बाहर जाने के प्रमाण नहीं मिलते और क्यों भारत से आधी धरती से अधिक बड़े क्षेत्र में सांस्कृतिक प्रसार के साक्ष्य मिलते हैं।

इसके अतिरिक्त हम भारतीय उप महाद्वीप पर मानव जीवन के शान्पिूर्ण सहअस्तित्व को भी तभी समझ सकते हैं। वैदिक भारतीयों ने आरंभ से ही भारत में एक मानवीय समाज का प्रवर्तन किया था। लेकिन आज जब हमने उनसे बिल्कुल मुंह मोड़ लिया है हमारे जीवन में विघटन और वैमनस्य, अंधविश्वास और कटुता अधिकाधिक प्रबल होती जा रही हैं। हमसे यह कहा जाता है कि यह पुराने भारत के कारण है। कितने आश्चर्य की बात है कि वह प्रभाव जो पुराने भारत में कहीं नहीं दिखता वह पुराने भारत से स्वयं को दूर कर चुके नये भारत में है।

हम चाहे किसी भी धर्म के क्यों न हों लेकिन हमारा सांस्कृतिक स्रोत अविच्छिन्न और एक है। यह बात वेदों में वर्णित कामनाओं और प्रार्थनाओं में, उनकी भाषा और अभिव्यक्ति में सरलता से देखी जा सकती है। इसलिये जब हमसे यह कहा जाता है कि ब्राह्‌मण धर्म ही हमारी समस्याओं का कारण है और उसके बीज वेदों में निहित हैं तो हमें एक बार उस व्यवस्था और उसमें निहित सांस्कृतिक सामग्री पर दृष्टि डालने की आवश्यकता है। इससे पहले कि हम किसी आरोप की दासता स्वीकार कर लें हमें एक बार उस आरोप की शक्यता पर अवश्य विचार कर लेना चाहिये। हमें यह अवश्य जानने का प्रयास करना चाहिये कि वे सारी जटिल सामाजिक संरचनायें जो शोषण और दासता के लिये आवश्यक होती हैं, उस समय संभव हो सकती थीं। यह भी कि क्या वे लोग जिन पर यह आरोप लगाया जाता है इस संभव स्थिति में हो सकते थे कि वे लोगों का शोषण कर सकें। यह भी कि शोषित होने के लिये साधन सम्पन्नता भी थी या नहीं।

इसके अतिरिक्त हमें उन लोगों के दुष्कर जीवन और उनके सोच विचार तक पहुंचने के लिये भी कल्पना शक्ति के उपयोग की आवश्यकता है जो हमारे लिये इतनी विशाल, मानवीय और उदार सांस्कृतिक विरासत छोड़कर गये हैं। हमें उन पीढ़ियों के त्याग और तपस्या के बारे में भी अवश्य सोचना चाहिये जिन्होंने इतनी विपुल साहित्यिक राशि के रख रखाव में अपने जीवन को खपाया।

उपर्युक्त विवरण किस तरह आपके आज के जीवन से और हमारी भावी पीढ़ियों के जीवन से संबधित है, अवसर मिलने पर हम आपके सामने यह भी स्पष्ट करेंगे। अभी तो हमारा आशय केवल आपको उस कठिनाई से परिचित कराना है जो हमारे पूर्वजों के सामने रहीं होंगी। जिन्हें हम केवल इसलिये तिरस्कृत कर देते हैं कि हम अपनी सहूलियतों और उनकी देन से सम्पन्न हैं।

– संजीव कुमार

इतिहास की संरचना

– संजीव कुमार

किसी के लिये भी यह बिल्कुल बाध्यकारी नहीं है कि वह इतिहास पढ़े, लिखे या उस पर बात करे। तब भी लोग यह बाध्यता स्वयं पर आरोपित करते हैं। वे न केवल इतिहास पर बात करते हैं बल्कि उसके लिये झगड़ते भी हैं। हममें से बहुत से लोगों के लिये इतिहास अपनी भावनाओं और विचारों के लिये उचित लक्ष्य प्रतीत होता है। लोगों में इतिहास से सीखने की इच्छा चाहे जितनी कम हो, लेकिन उसके परिमार्जन और परिष्कार का प्रयास वे अपनी सारी शक्ति लगाकर कर लेना चाहते हैं। हम अनुमान लगा सकते हैं कि ऐसी कौन सी बात या बातें हैं जो लोगों को इतिहास की ओर मोड़ती हैं? दुर्भाग्यवश ऐसे अनुमानों की संख्या उतनी ही हो सकती है जितने धरती पर लोग हैं। इसका यह कारण बिल्कुल नहीं है कि इतिहास धरती का सर्वाधिक लोकप्रिय विषय है, बल्कि इसका बहुत सीधा और सरल सा कारण है कि यह इतिहास ही है जो हमें बनाता है।

यदि हम विज्ञान अथवा सामाजिक विज्ञानों की बात करें तो इतिहास अकेला ऐसा विषय है जिसकी कोई विषयवस्तु नहीं है। जिसकी कोई विशेष प्रविधि नहीं है। इसके अलावा विभिन्न विषयों का उपयोग इसमें किया जाता है, शायद ही किसी अन्य विषय में किया जाता हो। यहां तक कि किसी इतिहास की पुस्तक के विषय में निश्चयात्मक रूप से यह कहना बहुत कठिन हो जाता है कि वह किसी विषय का अध्ययन है, अनुसंधान है, अतीत में हुई घटनाओं का संकलन है, अटकले हैं अथवा विचार विमर्श है? वास्तव में रोचकता और उत्तेजना से भरे हुये पृष्ठ एडम स्मिथ के अनुसार ‘अदृश्य हाथों‘ एवं हीगेल के अनुसार ‘तर्क की चतुराइयों‘ की प्रस्तुति मात्र है।

यह कहना और भी कठिन है कि जब हम इतिहास में रुचि लेते होते हैं तब ठीक ठीक क्या कर रहे होते हैं? हम वर्तमान को बीते हुये कालों में खोज रहे होते हैं या वर्तमान का अतीत पर आरोपण कर रहे होते हैं! बीते हुये से हमारा सम्बन्ध अनिश्चित सा हो जाता है क्योंकि वह हमसे छूटकर किसी व्यापक, अदृष्ट कालराशि का हिस्सा बन जाता है। बहती हुई नदी के किनारे खड़े होकर जब हम नहा चुकते हैं तो हमारे शरीर से ढरकता हुआ पानी पुनः उस असीम जलराशि का हिस्सा बन जाता है। हम उसे कभी वापस नहीं पा सकते। अनंत समय से अनंत समय तक चेतना की विविध चेष्टायें अस्तित्व ग्रहण करती हैं और अपना सत्व छोड़कर लुप्त हो जाती हैं। जल चक्र की भांति चेतन प्राणियों के जीवन भी अनंत सृष्टि की धारा की पूर्ति करते हैं। बहुत थोड़े समय के लिये अपने अहं का उपभोग करते हैं। उसके बाद उनके जीवन का सार उसमें निहित हो जाता है जिसे हमारे पूर्वजों ने ॠत कहा है। वह ॠत ही है जिसमें धर्म, ज्ञान, सृष्टि और सभी छोटी बड़ी सत्तायें अवस्थित हैं। ॠत की यह अमूर्त और विशिष्ट धारणा आज भी हमारी समझ का उतना ही उचित प्रतिनिधित्व करती है जितना अतीत में करती रही है।

इस दार्शनिक विवेचन से हम इतना भर कर सकते हैं कि अतीत का बोध इतिहास के रूप में कर लें लेकिन इतिहास का आशय अतीत से कुछ अलग होता है। अतीत का कोई मंतव्य नहीं होता लेकिन इतिहास का होता है। अतीत स्मृति का, स्मरण करने का विषय होता है लेकिन इतिहास व्याखया और आकलन का विषय होता है। सबका अपना अतीत होता है लेकिन कुछ का ही इतिहास होता है। अतीत के सारे तथ्य इतिहास नहीं बनते। यही नहीं अतीत के एक ही तथ्य से इतिहास के कई तथ्य बन जाते हैं। सबका अपना इतिहास होता है लेकिन वह बनता है अन्यों के इतिहास को समाविष्ट करके। यही कारण है कि संसार में इतिहास की इतनी छीना झपटी की जाती है।

वस्तुतः इतिहास विज्ञान अथवा कला की अपेक्षा भिन्न क्षेत्र है। विज्ञान की समझ मनुष्य को शक्तिशाली बनाती है। कला जीवन का आस्वाद और प्रभाव क्षेत्र बढ़ाती है। साहित्य संगठन की चेतना का विकास करना है। लेकिन इतिहास दो धारों वाली तलवार का काम करता है। खतरे के समय यह आपको सुरक्षित और दुर्भेध्य बनाती है और जिनमें शोषण एवं आक्रमण की प्रवृत्ति है उनको अधिक नियंत्रक व शक्तिशाली भी बनाती है।

अतीत के तथ्यों को इतिहास में बदलने का काम इतिहासकार करता है। वही यह निश्चय करता है कि किन तथ्यों को कब और कहां प्रस्तुत किया जाये और कैसे प्रस्तुत किया जाये? लेकिन इतिहासकार को शिल्पकार की भांति कच्चे माल को मनचाहे ढंग से कल्पना या मांग के अनुसार रूप देना नहीं है। उसे अपने कच्चे माल को तर्कसंगत रूप देना पड़ता है। इस तार्किक संगति की कसौटी को पार करने के लिये ही इतिहासकार कल्पना और विवरण, व्याखया और पुनर्प्रस्तुति का उपयोग करता है। इस प्रकार उसके द्वारा काम कर दिये जाने के बाद इतिहास उपयोग के लिये एकदम तैयार हो जाता है। ठीक उसी प्रकार जैसे विज्ञान और साहित्य अपने अंतिम फलितार्थ में उपयोग के लिये तैयार हो जाते हैं। इसके बाद के लिये ठीक ही कहा जाता है कि वास्तविक दोषी राजनीति ही है जो इन सबका दुरुपयोग करती है।

विज्ञान इस अर्थ में अवश्य ही सार्वभौम हैं कि वह मनुष्य की चेतना और इच्छा से स्वतंत्र है। प्रकृति अपने नियम से संचालित है। मनुष्य अपनी समझ बढ़ाकर उसका लाभ भर उठा सकता है। उसे स्वयं ही यह समझना है कि उसके लिये कितना लाभ उठाना संभव है और कैसे? परन्तु विज्ञान की समझ सामाजिक होती है और उसकी वृद्धि उस समाज को उसके निकटवर्ती अन्य समाजों और एक छोटे दायरे में प्राकृतिक परिवेश को नियंत्रित करने की शक्ति भी देती है। समस्या यही है कि नियंत्रित समाज भी यदि अपनी समझ बढ़ा ले और उस अंतर को पाट दे तो इस नियंत्रण को और अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। न ही विज्ञान की समझ को विकसित होने से रोका जा सकता है। एक बार अस्तित्व में आने के बाद विज्ञान स्वतःप्रसारी है। उसकी यह प्रकृति उसके दुरुपयोग पर रोक लगाती है।

साहित्य मनुष्य के लिये बड़े सुख और विकास का साधन है। वस्तुतः किसी भाषा का साहित्य उसके उपयोगकर्ताओं की मनोवैज्ञानिक आत्मा है। साहित्य अपने पाठकों में एक मानवीय संवेदना उत्पन्न करता है जो उसमें व्यापक जीवनगत तत्वों के अस्तित्व का बोध उत्पन्न करती है। निसंदेह यह धारणा समझने में थोड़ी कठिन है। व्यापक जीवनगत तत्वों से हमारा आशय अन्य प्राणियों के चेतन अस्तित्व की संवेदना और बोध का होना है। साहित्य पाठक (वास्तव में आस्वादक क्योंकि साहित्य मौखिक भी होता है।) की अनुभूति को इतना प्रबल कर देता है कि वह न केवल अपने जैसे मनुष्यों के सुख दुख बल्कि मानवेतर प्राणियों के भी सुख दुख को अनुभव करने लगता है।

हम सभी को उन्माद और हंसी उत्पन्न करनेवाली कविताओं, कहानियों, चुटकुलों का अनुभव है। यह साहित्य का निकृष्टतम रूप है जो बेहद मजेदार लगता है। इसी से मिलते जुलते आवेग की शैली के लेखक हैं जो सांप्रदायिक कारणों से घृणा, अलगाव और दायित्वहीनता का बोध बढ़ाने का प्रयास करते हैं। इन्हें भी खूब पढ़ा जाता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि खराब साहित्य भी हमें अच्छे साहित्य की ओर ले जाता है। किसी भी व्यक्ति के लिये नकारात्मक भावनाओं को अधिक देर तक ढोना संभव नहीं होता इसलिये खराब साहित्य के अधिक संपर्क में रहने वाला आस्वादक या तो साहित्य विमुख हो जाता है या मानवीय साहित्य की ओर अभिमुख हो जाता है। भाषा का अनवरत उपयोग निरंतर अर्थविस्तार के लिये प्रेरित करता है जो खराब साहित्य में संभव नहीं है। इन कारणों से हमने देखा है कि पाठक/आस्वादक जो साहित्य के निरंतर संपर्क में रहते हैं वे कम हिंसक, अधिक संवेदनशील और विचार विमर्श के प्रति आग्रह जैसे सकारात्मक गुणों से युक्त देखे जाते हैं।

इन अर्थों में इतिहास न तो विज्ञान की तरह स्वतःप्रसारी है और न ही साहित्य की तरह प्रतिरोधी मानवीय चेतना के गुण से युक्त है। इतिहास वास्तव में तो कोई विषय ही नहीं है। विभिन्न विज्ञानों की सहायता से अतीत के संबंध में प्राप्त होने वाली जानकारी का संग्रह कर लिया जाता है। यह संग्रह विभिन्न विषयों के दायरे में ही कैद रहता है और उसे अधिक से अधिक तथ्य का दर्जा दिया जाता है। किंतु इन तथ्यों से जब वर्तमान के किसी अंश को अथवा अतीत के ही वर्तमान से सम्बद्ध हो चुके किसी अंश को प्रकाशित करने का काम लिया जाता है तो वह इतिहास बन जाता है। इतिहास तब भी बनता है जब हम भिन्न कालों के तथ्यों को संबद्ध करने का प्रयास करते हैं। भलें ही हम न समझ पायें लेकिन संबद्धता के इन प्रयासों में वर्तमान सदा ही जोड़ने वाले तत्व के रूप में उपस्थित रहता है।

इतिहास की प्रकृति की इस संक्षिप्त धारणा का हम उसके अपने जीवन में उपस्थिति से आकलन करने का प्रयास करेंगे। यह आवश्यक नहीं कि हम इतिहास तक चलकर ही जायें। वह भी चलकर हम तक आ जाता है। हमारे जीवन में इतिहास दो रूपों में होता है बाध्यकारी और आरोपित। आरोपित तब जब हमें इतिहास की व्याखयाओं के अनुसार चलने के लिये प्रेरित किया जाता है, अर्थात्‌ इतिहास को हम पर आरोपित किया जाता है। बाध्यकारी वह तब होता है जब वह हमारी इच्छा से परे हमें हमारे जीवन यापन के ढंग और परिवेश के माध्यम से प्रभावित करता है। इन्हें हम इतिहास के व्यक्त और अव्यक्त रूप कह सकते हैं। अव्यक्त या बाध्यकारी रूप उन विषयों में निहित हैं जिनका उपयोग हम अपने जीवन में करते हैं किंतु जिनके अर्थ अतीत में निहित होते हैं। ये हैं भाषा, संस्कृति, साहित्य, रीति रिवाज आदि। रोचक परिस्थिति यह भी है कि इतिहास की चेतना से युक्त ये विषय इतिहास के आरोपित रूप अर्थात्‌ उसकी व्याखयाओं के प्रति हमें अधिक संवेदनशील बना देते हैं।

हम अपने जीवन में जिस भाषा का प्रयोग करते हैं उसका बहुत बड़ा हिस्सा हमें पहले से ही निर्धारित अर्थ के साथ मिलता है। हम अपने स्तर पर उनमें अधिक बदलाव नहीं कर पाते हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि हम उनके आशय को ढो रहे हैं। उन लोगों के जो सुदूर अतीत में कभी थे लेकिन अब कभी नहीं होंगे। वे केवल उस भाषा में जीवित हैं जिसे वे हमारे उपयोग के लिये छोड़ गये हैं। यदि कभी अर्थ संबंधी परिवर्तन होता भी है तो साहित्य, रीति रिवाज और अन्य भाषिक संरचनायें छूट गये या बदल गये अर्थ की स्मृति को कई बार संरक्षित कर लेते हैं। कुछ मामलों में ही सही इस संरक्षण के कारण नये अर्थ विस्तार से भाषाई संस्कृति के रूप परिवर्तन की प्रक्रिया तब तक के लिये धीमी पड़ जाती है जब तक कि वह भाषा ही लुप्त न हो जाये।

रीति रिवाज, संस्कृति और साहित्य भी अपने अपने ढंग से पुराने समय के आशय को संरक्षित करके रखते हैं। चूंकि उनमें अनुमोदन और सहमति का व्यापक निवेश होता है इसलिये उन्हें तात्कालिक ढंग से नहीं बदला जा सकता है। इसका अर्थ है कि वे हमें दोहराव और स्मरण के लिये बाध्य करते हैं। ये बहुत सामान्य से शब्द हैं जो इतिहास के अव्यक्त रूप को हमारे सामने लाते हैं। उक्त चीजें अतीत से हमारे संपर्क को बनाये रखती हैं और इतिहास से भी हमें परिचित रखती हैं। हम बार बार अतीत और इतिहास का उल्लेख साथ साथ इसलिये कर रहे हैं कि आपको यह याद रखने में आसानी हो कि इतिहास अतीत के संचय के अतिरिक्त भी कुछ है जो सौद्‌देश्य है और जिसका सदुपयोग या दुरुपयोग किया जा सकता है। किंतु जिस अर्थ में इतिहास हमारे साधारण यहां तक कि अनपढ़, अशिक्षित जन के जीवन में भी उपस्थित होता है उसके कारण भी इतिहास के दुरुपयोग की शक्ति कमजोर पड़ती है। दुरुपयोग के प्रति इस प्रतिरोध की संभावित उपस्थिति ही इतिहासकार के लिये कसौटी का काम करती है और उसे अधिक पथभ्रष्ट होने से रोकती है।

हमने संस्कृति, भाषा और साहित्य को इतिहास कहा है क्योंकि इन सबमें इनके प्रचलन के समय के समाज की व्याखया और उनके प्रति दृष्टिकोण भी समन्वित हो जाता है। हम नये अर्थों का निर्माण चाहे तुरंत न कर पाते हों लेकिन पुराने अर्थों की अवहेलना करने में तत्परता बरतते हैं। हम उनका तिरस्कार करते हैं क्योंकि हम उनसे या तो सहमत नहीं हो पाते हैं या वे हमारे लिये उपयोगी नहीं रह जाते हैं। नये अर्थ अथवा आशय के निर्माण के लिये व्यापक सहमति की आवश्यकता होती है इसलिये सामाजिक क्रियाओं में निहित इतिहास सदैव अमल में आनेवाला इतिहास ही बना रहता है, निर्णयकारी इतिहास बहुत कम बन पाता है।

व्यक्त इतिहास इतिहासकारों के कार्यों में देखा जा सकता है। लेकिन हमारे समय में इसका एक भिन्न और चिंतित कर देने वाला रूप भी है। वह है संचार माध्यमों और लेखकों के मध्य इतिहास की व्यापकता। आज का समय व्यापक संचार माध्यमों का है। लोग एक दूसरे से बहुत दूर होकर भी परस्पर बातचीत कर लेते हैं। यह समय सस्ते संचार माध्यमों और सस्ती सुलभ पुस्तकों और पठनीय सामग्री का है। वर्तमान संचार और विमर्श की एक अनूठी विशेषता यह भी है कि इसमें बात गढ़ने का पूरा अवकाश रहता है। कम पढ़े लिखे लोग भी अपनी बात को विचार के रूप में, तथ्य के रूप में या मत के रूप में हमारे सामने रख सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति पढ़ा लिखा हो और परिश्रमी भी हो तो वह तथ्य और निष्कर्ष के बीच के अंतर को धुंधला कर सकता है। भाषा के प्रयोगों के द्वारा अर्थ और अनर्थ का स्थान परिवर्तन कर सकता है। साधारण अल्पशिक्षित व्यक्ति इन सबमें अंतर करने में सक्षम नहीं होता। अधिकांश मामलों में वह या तो उसे स्वीकार कर लेगा या नकार देगा। किसी भी स्थिति में वह मूल सामग्री की ओर नहीं जायेगा क्योंकि वह उसकी पहुंच और योग्यता से परे स्थित है। जहां यह अनर्थकारी सामग्री प्रयास करके उस तक पहुंचाई जाती है, वहीं मूल संदर्भ तक जाने के लिये उसे स्वयं परिश्रम और इच्छा करनी पड़ेगी जिसकी प्रायः कोई संभावना नहीं रहती।

 इतिहास के चिंताजनक प्रसार का एक दूसरा रूप भी है जो अधिक औपचारिक है। वह है आधुनिक युग की विद्यालयीन शिक्षा। आधुनिक युग की शिक्षा का स्वरूप विमर्श का नहीं है बल्कि शिक्षक से छात्र की ओर निर्देशात्मक है। पाठ्‌यसामग्री के कथन मानक सत्य के रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं। भारत जैसे देशों में यह और भी रूखा और कर्कश हो जाता है जहां शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता उल्लेखनीय नहीं है। पाठ्‌यसामग्री का चयन और व्याखया विशेषकर इतिहास और समाज विज्ञानों के क्षेत्र में अभी भी साम्राज्यवादी स्वरूप का है अथवा राजनैतिक आवश्यकताओं के अनुकूल है।

शिक्षा का यह औपचारिक स्वरूप अध्ययन की किसी गंभीर प्रवृत्ति का विकास नहीं करता। एक बार इससे निकल जाने के बाद लोग शायद ही कुछ उल्लेखनीय पढ़ते हैं। यही नहीं अपने शैक्षणिक काल में उनका पाला शायद ही कभी किसी संदर्भ ग्रन्थ से पड़ता होगा। उनके लिये स्तरीय और विश्वसनीय विषयगत सामग्री तथा स्तरहीन और साधारण प्रचारात्मक सामग्री में विभेद कर पाना भी संभव नहीं होता। दुर्भाग्यवश यह स्थिति साधारण जन की ही नहीं है बल्कि उन अधिकांश लोगों की भी है जो नीति निर्णय के प्राधिकार का उपयोग करते हैं, सार्वजनिक विमर्श में महत्वपूर्ण स्थिति में पहुंच जाते हैं अथवा लेखन कार्य, पत्रकारिता जैसे ज्ञान मीमांसा के क्षेत्र में विश्वसनीय समझे जाने वाले काम करने लगते हैं।

इसका परिणाम भी घातक हो रहा है। वास्तविक इतिहास लेखक जिस बात को कहने में हिचकिचाते हैं, उसे अधकचरे लेखक और राजनैतिक कार्यकर्ता प्रायः वैज्ञानिक सिद्धान्तों जैसा प्रामाणिक बनाकर प्रस्तुत करते हैं। जिन सिद्धांतों को पुराने लेखकों ने स्वयं ही अटकल अथवा अनुमान के रूप में हिचकिचाते हुये सामने रखा था, उन्हें ये लेखक ज्यामिति के स्वयं सिद्धों की तरह काम में लाते हैं। साम्राज्यवादी लेखक जैसे इतिहास को यूरोप की दृष्टि से देखते थे, हमारे यहां भारतवादी लेखक भी हैं जो संसार को भारत की दृष्टि से ही देखने का प्रयास करने में व्यस्त रहते हैं। साम्राज्यवादी इतिहास लेखन के विषय में यह सोचा जाता है कि वह अब उपयोगी न रह जाने के कारण त्याग दी गई होगी। यह सच नहीं है। लेखक चूंकि अंग्रेजी में लिखते हैं जिसके पाठक आज भी पुराने साम्राज्यों से लगाव रखते हैं इसलिये इन लेखकों को अधिक स्वयं की प्रेरणा से अथवा प्रकाशकों के आग्रह पर अधिक बिकने के लिये साम्राज्यवादी दृष्टि अपनानी पड़ती है। मार्क्सवाद स्वयं को वैश्विक अवधारणा के रूप में जाने जाने के लिये साम्राज्यवादी धारणा को अपना लेता है क्योंकि पुराने साम्राज्यवाद की यह धारणा थी कि किसी भी वैश्विक संदर्भ में साम्राज्य ही केन्द्र में और उद्धारक के रूप में होना चाहिये।

 ज्ञानार्जन एक बार में परिश्रम करके संचित कर लिया जाने वाला काम नहीं है। न ही इसे पीढ़ीगत उत्तराधिकार अथवा दानादि द्वारा एक से दूसरे तक अंतरित किया जा सकता है। नियमित पठन, स्वाध्याय, निष्पक्ष व गंभीर सामग्री की पहचान की योग्यता आदि के द्वारा अर्जित ज्ञान का रखरखाव और संवर्धन करना पड़ता है क्योंकि मस्तिष्क में संचित ज्ञान का निरंतर क्षय होता है। निरंतर बदलने वाली परिस्थितियों के कारण इतिहास, साहित्य आदि की बहुत सी जानकारी तो अप्रासंगिक भी हो जाती है।

हमारे देश में उपर्युक्त परिस्थिति ने सामाजिक बोध के स्तर पर बहुत अधिक अराजकता उत्पन्न कर दी है। एक तो इतिहास जैसे दृष्टिकोण प्रधान विषय में उपलब्ध सामग्री वेदैशिक प्रभाव से युक्त है, द्वितीयतः वह तात्कालिक आवश्यकताओं, वैमनस्य, प्रतिशोध और घृणावाद की व्याखयाओं के दबाब में है। सामाजिक विज्ञानों के क्षेत्र में प्रायः कोई प्रगति न होने के कारण स्थिति और भी सोचनीय हो गई है। नियमतः इतिहास को अपनी व्याखयाओं के स्रोत के लिये सामाजिक विज्ञानों की ओर देखना चाहिये लेकिन उस ओर बिल्कुल अंधेरा है। इन और ऐसे ही अन्य कारणों से हमारे सामाजिक विमर्श का परिदृश्य धुंध और छायाओं से भरा हुआ है।

इस धुंध में, इन छायाओं में हमारी पहचान निरंतर घुलती जा रही है। हम निरंतर अपने आपको कमतर, छोटा करते जा रहे हैं। इसका एक कारण तो यह है कि हम निरंतर उपजीवी, द्वितीयक और हीन श्रेणी के विमर्श पर निर्भर होते जा रहे हैं तथा दूसरा व अधिक महत्वपूर्ण कारण यह है कि हमने अपना कोई पक्ष, अपनी कोई दृष्टि ही विकसित नहीं की है। वस्तुतः दृष्टि के अभाव की यह समस्या हमारे इतिहास से ही हमें विरासत में मिली है। इसलिये यह अपरिहार्य होगा कि हम अपने लिये अपने स्वयं के परिप्रेक्ष्य की आवश्यकता का निर्धारण व परिभाषीकरण अपने सामूहिक अतीत में और उसमें निहित कतिपय समस्याओं के द्वारा करेंगे।

अपनी दृष्टि की बात इसलिये महत्वपूर्ण है कि इसके साथ सामूहिक हम के निर्माण की धारणा जुड़ी हुई है। मानव जीवन में समाज की धारणा अमूर्त नहीं होती। व्यक्ति न केवल भौतिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी कभी अकेला नहीं होता। वह हमेशा एक समाज का अंग होता है। वास्तव में वह एक समाज का अंग नहीं होता। वह एक साथ कई समाजों का अंग होता है। जिस तरह व्यक्ति शब्द कई प्रकार की बनावटों वाले लोगों के लिये प्रयोग की जाने वाली संज्ञा है वैसे ही समाज शब्द का प्रयोग भी हम कई प्रकार की लोगों की जमावटों के लिये करते हैं। जैसे हर व्यक्ति एक मैं होता है उसी प्रकार हर समाज एक हम होता है।

हम एक साथ एक ही समय में कई समाजों में रहते हैं। ऐसे कई कारक हैं जो मनुष्यों का समूहन करते हैं। जैसे भाषा, स्थान विशेष, राजनैतिक अथवा सांस्कृतिक कारक आदि। इन्हें समुदाय भी कहा जाता है लेकिन मानव चेतना में इनकी स्थिति समाज की ही होती है क्योंकि व्यवहार और संबोधन में किसी कारक से जुड़े प्रसंग में संबंधित जन अपने आपको एक हम में समाविष्ट करते हैं। जैसे हम हिंदी भाषी, हम मध्य प्रांतीय, हम सिक्ख, हम दलित आदि। इस वर्गीकरण से आप आसानी से समझ सकते हैं कि हर व्यक्ति एक ही समय में कई हमों का सदस्य हो सकता है अर्थात हम कभी भी एक मानव समाज में नहीं रहते बल्कि कई मानव समाजों में रहते हैं। किसी एक समाज में जो लोग हमारे सामूहिक हम का हिस्सा हैं वे किसी दूसरे समाज में नहीं भी होंगे जो एक में नहीं थे वे दूसरे में हो जायेगे। मानव व्यवहार की विचित्रता और आकस्मिकता इसी जटिलता में छुपी है।

ये समाज मात्र देश(स्थान) में ही नहीं फैले होते बल्कि इनका फैलाव काल में भी होता है। उदाहरण के लिये किसी भाषा के समाज को लें। उस भाषा की और उसे बोलने वाले लोगों का अस्तित्व अतीत में भी होता है। पर अतीत अब अस्तित्व में नहीं है। वे लोग भी मर चुके हैं। इसके बावजूद उस भाषा के जीवित बोलने वाले लोगों के हम का अस्तित्व वे मृतक और वह बीता समय भी होता है। इसी प्रकार आने वाला संभावनाशील समय भी। यहां इतिहास वर्तमान से मिल जाता है। इसी से हम समझ सकते हैं कि इतिहास को अपने आपसे अलग करना क्यों संभव नहीं है!

इस तरह सैद्धान्तिक रूप से हम जिस मानव समाज के बारे में बात करते हैं, वह हमें हमारे व्यवहार में कहीं मिलता ही नहीं है। क्योंकि व्यवहार के लिये हम हमेशा किसी एक कारक को चुनने के लिये बाध्य होते हैं इसलिये हम उस कारक से बनने वाले समाज को चुन पाते हैं। उदाहरण के लिये यदि हम भाषा सम्बंधी किसी व्यवहार की अनुक्रिया कर रहे होते हैं तो उस भाषा के समाज के सदस्य के रूप में अनुक्रिया करते हैं। कभी कभी हम ऐसी स्थिति में फंस जाते हैं कि हमें दो विपरीत दिशा वाले समाजो का प्रतिनिधित्व करना पड़ता है। जैसे भाषा अथवा धर्म का द्वैध या धर्म अथवा संस्कृति का द्वैध। ऐसी स्थितियां हमारे लिये तनाव की निरंतरता के रूप में अभिव्यक्त होती हैं जो अपनी सामाजिक प्रकृति के कारण सामाजिक तनाव का रूप ले लेती हैं।

जब हम अपने बारे में अथवा अपने समाज के बारे में बात करते हैं तो अपने लिये सरलतम दृष्टि, सरलतम विकल्प चुन लेते हैं। यह सरलता बाध्यकारी किंतु हानिकारक होती है। इन परिस्थितियों में अभिव्यक्ति तो सरल हो जाती है लेकिन संप्रेषण कठिन और भ्रमित कर देने वाला हो जाता है। अभिव्यक्ति की सरलता अर्थ की अनिश्चयता को बढ़ा देती है। सरल और दैनिक जीवन के शब्दों में अर्थ संबंधी अनिश्चितता रहती है। हमारे दैनिक जीवन की भाषा संक्षिप्त समय और सीमित देश (स्थान) के लिये बनी होती है। उनसे इतिहास या विज्ञान सम्बंधी किसी व्याखया को व्यक्त कर पाना बहुत अधिक कठन होता है।

इतिहास से लेकर भाषा तक हमने बहुत से विषयों का उल्लेख यहां किया है। इससे भी पाठकों के मन में उलझन उत्पन्न होने की संभावना है। इसका कारण यह है कि यहां हम एक भिन्न विषय अपनी संस्कृति के आदि स्रोत और उससे हमारी आज की व आगे की पहचान पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करने जा रहे हैं न कि किसी विषय विशेष की जानकारी देने का प्रयास कर रहे हैं। पिछले अंक में हमने यह प्रस्ताव पाठकों के सम्मुख रखा था कि वे वेदों के सम्बंध में अपनी धारणाओं को टटोलें। अधिकांश लोगों का मानना है कि वेद हिंदुओं के धर्मग्रन्थ हैं। हिंदू भी इसे नकारते नहीं हैं। लेकिन व्यवहार में वे एक विचित्र धर्म का अनुपालन करते हैं जो वेदों में निहित धर्म सम्बंधी मान्यताओं से बिल्कुल भिन्न है। यही नहीं वे वेदों का इतना कुछ आदर भी नहीं करते। किसी हिंदू के सामने गीता अथवा भागवत की आलोचना करिये। वह लड़ने को हो जायेगा। लेकिन वेदों की निंदा भी आप करेंगे तो वह तटस्थ होकर सुनता रहेगा। स्वयं वेद भी आज के अर्थ में जो धर्म है उसका प्रस्ताव नहीं करते हैं।

हमने यह भी कहा था कि वेद हमारे आदि पूर्वजों का मंतव्य हैं। वे हमारी संस्कृति का आदि अथवा मूल स्रोत हैं। यह बात केवल वर्तमान भारत के निवासियों के लिये ही सच नहीं है बल्कि उन लोगों के लिये भी उतनी ही सच है जो आज श्रीलंका, पाकिस्तान अथवा बांग्लादेश में रहते हैं और स्वयं को वेदोक्त धर्म का अनुयायी नहीं मानते। यों तो वैदिक काल की भाषा के संबंधसूत्र संसार की बहुत सी भाषाओं और बड़े भू भाग तक फैले मिलते हैं। जहां तक उनके हमारे पूर्वज होने की बात है तो उसे पूर्वज शब्द से व्यक्त होने वाली धारणा को ठीक से समझने की आवश्यकता है। सामान्यतः हम अपने परिवार के पिछली पीढ़ियों के लोगों को अपना पूर्वज मानते हैं क्योंकि उनसे हमें विरासत में सम्पत्ति मिलती है। परंतु संपत्ति सबसे कम महत्वपूर्ण विरासत है। हमारे पास चाहे जितनी संपत्ति हो जाये जीवन बिताने के लिये उसका एक विशेष हिस्सा ही काम आ सकता है। लेकिन अधिक महत्वपूर्ण विरासत है भाषा, साहित्य, धर्म और संस्कृति जैसी सत्तायें। हमारा जीवन हमारे चाहे अनचाहे इन्हीं में बीतता है। जो लोग इन्हें बनाते, परिष्कार करते हैं वे ही हमारे वास्तविक पूर्वज हैं। विज्ञान और वेद दोनो की दृष्टि से रक्त अथवा विवाह संबंध का महत्व और औचित्य जीवनगत है अर्थात्‌ मनुष्य के जीवित रहने तक है। एक वैदिक }चा में शोकाकुल पत्नी को जिसका पति हाल ही में मरा है संबोधित करते हुये कहा गया है कि यह व्यक्ति मर चुका है, अब इससे तुम्हारा कोई संबंध नहीं रह गया है। अब यह वापस नहीं आयेगा इसलिये और अधिक शोक मत करो। उठो, अपने घर जाओ और बचे हुये जीवित व्यक्तियों के साथ सुखपूर्वक रहो।

 पूर्वजों संबंधी अपनी धारणा का परिष्कार करते हुये और इतिहास संबंधी भ्रमों का उन्मूलन कर, अपनी समझ बढ़ाकर ही हम अपने जीवन को अधिक सामंजस्यकारी और मानवीय बना सकते हैं। आज हमारे जीवन में जो भी पारस्परिक वैमनस्य और तनाव है उसका सबसे बड़ा कारण इतिहास संबंधी हमारी अनभिज्ञता और भ्रामक व त्रुटिपूर्ण विचारों को अपना लेना है। प्रस्तुत लेख में इतिहास संबंधी संक्षिप्त विवेचना के बाद हम दो ऐसे सामाजिक भ्रमों पर उदाहरण के रूप में थोड़ा सा विचार करते हैं जिनके कारण बहुत अधिक तनाव उत्पन्न होता है और जिनके बारे में प्रतिदिन हमें कुछ न कुछ पढ़ने या सुनने को मिलता है। पहला भ्रम है जाति और वर्ण के बीच संबंध तथा दूसरा हिंदू और मुसलमान दोनो की कौमो संबंधी भिन्नता है। हमारा आपसे आग्रह है कि इस लेख को पढ़ने के बाद आप इनके बारे में भिन्न भिन्न स्रोतों से सामग्री का संचय करें और उसका विश्लेषण करें। विश्लेषण करते समय इन विषयों के बारे में प्रचलित विभिन्न मतों की भाषा पर अवश्य विचार करें।

प्रथमतः जाति और वर्ण। हमें अंग्रेजों के समय से ही यह समझाया जाता रहा है कि ब्राह्‌मणों ने अपने समय में समाज को चार भागों में बांटा। उन्हीं से जातिया बनीं। इतिहासकारों का मानना है कि जातियों का निर्माण बड़े और व्यापक समाज के धीरे धीरे सम्मिश्रण और सामाजिक उन्नति की प्रक्रिया में पेशेगत श्रेणियों के बढ़ने के साथ हुआ। वर्ण व्यवस्था विभिन्न सामाजिक वर्गों के लिये समुचित धार्मिक कर्तव्यों का निर्धारण करने का विधान था जिसका सामाजिक श्रेणीकरण से अधिक संबंध नहीं था। इनका पारस्परिक संबंध बहुत बाद में बना। जाति व्यवस्था एक बुराई है लेकिन उसके लिये मूल धर्मग्रन्थों में कोई प्रावधान नहीं है। वर्ण व्यवस्था के विषय में धर्मग्रन्थों में कोई प्रावधान ही नहीं किये गये हैं। बस कर्तव्यों का संक्षिप्त सा निर्देश है। स्मृतियों में जो कि धर्मग्रन्थ नहीं बल्कि विधिग्रन्थ हैं विभिन्न वर्णों के लोगों के सम्मिश्रण से उत्पन्न परिस्थिति के लिये निर्देश हैं। आज कुछ मिलावटों के आधार पर जातीय घृणा और वैमनस्य को बढ़ाने के लिये दिन रात प्रयास किये जा रहे हैं, साहित्य सृजन किया जा रहा है। हमारे ये बहादुर ब्राह्‌मणों के विरुद्ध दिन रात विषवमन करते हैं किंतु स्वयं अपनी जाति का अपनी निकटवर्ती जातियों के साथ सम्मिलन और एकीकरण में असफलता का उल्लेख भी नहीं करते।

 ऐसा ही विचित्र विषय है हिंदू और मुसलमानों का दो कौमों के रूप में स्वीकार किया जाना। संसार में कहीं भी धर्म कौम का निर्धारक नहीं है। एक पाकिस्तानी मुसलमान भी उतना ही भारतीय है जितना भारतीय हिंदू। दोनों के पूर्वज एक हैं, भाषायें एक हैं और संस्कृति भी एक है। संस्कृति के बहुत से घटक होते हैं जिनमें धर्म का हिस्सा बहुत छोटा होता है। यह कभी भी संभव नहीं होगा कि भारतीय मुसलमान अपनी संस्कृति अथवा इतिहास बदल लें। यही कारण है कि मध्यकाल में जब लोगों की अभिव्यक्ति सधी हुई और जटिल नहीं होती थी तब अरब के लोग भारतीय मुसलमानों को भी हिंदू ही कहा करते थे। यह अधिक सही संबोधन था। आज वे भले ही उन्हें हिंदू नहीं कहते लेकिन वे उन्हें अपना भी नहीं मानते। इस्लाम को वे ऐक्यकारी तत्व नहीं मानते।

हिंदू मुस्लिम वैमनस्य के भी वे ही कारण हैं जो जातिगत वैमनस्य के हैं। वे हैं इतिहास संबंधी भ्रामक विचार और निहित स्वार्थी तत्वों का उत्पन्न हो जाना। जन सामान्य के बीच घृणा और वैमनस्य को बढ़ाकर अलग थलग किया जा सकता है और उन्हें छोटे छोटे टुकड़ों में संगठित कर अपने पीछे लगाया जा सकता है और उनका शोषण किया जा सकता है। शातिर व्यक्ति सदा विघटन को बढ़ाने की दिशा में काम करते हैं। इसके लिये बस उन्हें सबसे पहले इतिहास में जाकर तोड़फोड़ करनी होती है।

जिस तरह उलझे हुये धागों को सुलझाने के लिये हम लंबाई में आगे पीछे जाकर उलझे हुये धागों को अलग अलग करते हैं तथा जहां धागे अधिक मिले होते हैं वहां उन्हें काटकर अथवा कठोरता से सुलझाकर अलग अलग करते हैं उसी प्रकार विघटकारी तत्व इतिहास में पीछे जाकर विघटन के सूत्रों को पकड़कर ले आते हैं। मानव समाज में बिखराव भी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। हर समय आपको ऐसे तत्व मिल जायेंगे जो समाज को विघटित कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। लेकिन ऐसे प्रयास सीमित और देश काल की दृष्टि से संक्षिप्त होते हैं। उनमें निरंतरता नहीं होती क्योंकि वे कुछ लोगों या समुदायों की स्वार्थपूर्ति या तुष्टि के लिये होते हैं। उन्हें आगे के समय तक लाने के लिये प्रायः इतिहास में तोड़फोड़ करनी पड़ती है। थोड़ी सी सावधानी से उसको परखकर आप उसे आसानी से पकड़ सकते हैं।

अंत में हम अपनी बात दो इतिहासकारों के शब्दों से करते हैं, –

”इतिहास की चेतना से युक्त लोगों में इतिहास खुद को दुहरा नहीं पाता इसका कारण यह है कि उसके पात्र नाटक के दूसरे प्रदर्शन के समय पहले से ही उसके परिणामों से वाकिफ होते हैं और इस तरह से उनकी क्रियायें उस ज्ञान से प्रभावित हो जाती हैं।” ई. एच. कार.

”न केवल अपने समय के बल्कि बीते हुये अन्य समयों के अनुचित प्रभाव से, अपने परिवेश के अत्याचार से और जिस हवा में हम सांस लेते हैं उसके दबाब से केवल इतिहास ही हमें मुक्ति दे सकता है।” जॉन एक्टन -लेक्चर्स ऑन माडर्न हिस्ट्री पृ ३३

इतिहास और इतिहास की समझ

संजीव कुमार

इतिहास अतीत से किस तरह भिन्न है, हमारे लिये यह भी सोचने का उचित विषय है। संभव है दोनो अभिन्न हों क्योंकि दोनो ही बीत गये, विगत से संबधित हैं। लेकिन अतीत तो हर घटना, व्यक्ति या विचार का हो सकता है। सब तो इतिहास में नहीं बदलता। फिर कब अतीत इतिहास में बदल जाता है और कब वह मात्र बीता हुआ रह जाता है इसे कौन तय करता है? अतीत के जो टुकड़े इतिहास बन जाते हैं वे फिर उस अतीत से कैसे जुड़ते हैं, क्या यह भी हमें नहीं सोचना चाहिये? हम जिस इतिहास से परिचित हैं, उसमें हमें ये और ऐसे ही प्रश्न कभी मिलते क्यों नहीं हैं? यदि मिलते हैं तो वे हमारी स्मृति का हिस्सा क्यों नहीं हैं? प्रश्नों की यह श्रंखला इतिहास की तरह ही अविच्छिन्न और विस्तृत है।

इतिहास से जुड़ी एक रोचक बात यह है कि विगत की यह यात्रा हम सदा अपने समय से आरंभ करते हैं। हम कभी वहां जाकर नहीं देखना चाहते हैं कि वहां क्या हुआ होगा? हम सदा वहां पहुंचकर बीते हुये में अपना अंश, अपना हिस्सा देखना, सूंघना चाहते हैं। किसी बीते हुये समय में हमारे होने का भला क्या औचित्य है? हमारी भावना, हमारी आत्मा कैसे वहां हो सकती है जहां हम उसे देख लेना चाहते हैं! यह विवेक का अतिक्रमण नहीं है? महत्वपूर्ण तो यह भी है कि ये पंक्तियां इतिहास से संबंधित हैं या साहित्य से? यदि हमारा विषय इतिहास है तो भावना, आत्मा, देखना, सूंघना जैसी अभिव्यक्ति यहां क्यों होनी चाहिये और यदि हमारा विषय साहित्य है तो हम बार बार इतिहास का उल्लेख क्यों कर रहे हैं?

वास्तव में इतिहास कोई विषय नहीं है, कोई विज्ञान नहीं है। यह हमारी जिज्ञासा की विभिन्न विषयों के द्वारा पूर्ति का प्रयास है। शायद ही आप इससे सहमत हों लेकिन तर्कसंगत स्थिति यही है। विगत काल के किसी खण्ड में कोई घटना, कोई परिवर्तन होता है जिसका उल्लेख हमारे सामने किसी प्रकार आ जाता है। हम उस प्रसंग का आकलन उसके अनुकूल विषय की प्रविधि और सिद्धांतों की सहायता से करने लगते हैं। लेकिन जो बात हमारे लिये रुचिकर बन जाती है वह है इतिहास के नाम से की गई पुनर्कल्पना। वह निसंदेह साहित्य की किसी कृति की भांति रोचक, पठनीय और भावाकुल कर देने वाली होती है। हम उनमें मात्र इतना अंतर कर पाते हैं कि साहित्यिक रचना को नितांत काल्पनिक मान लेते हैं और इतिहास की रचना को वास्तविक या वास्तविकता से बहुत मिलती जुलती। उसके वास्तविक होने का विश्वास ही उसे पढ़े जाने के बहुत बाद तक उसका हमारी स्मृति में बने रहने का कारण होता है।

तो क्या इतिहास का कोई साहित्यिक मूल्य भी होता है? हमारी समझ तो यह नहीं कहती। हम इतिहास के प्रसंगों को ठीक उसी प्रकार याद रख पाते हैं जिस प्रकार अपने जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंगों को, निसंदेह ब्यौरों और व्याख्याओं सहित। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार हम उन्हीं ब्यौरों को याद रख पाते हैं जिनकी वास्तविकता में हमारा विश्वास सकारात्मक हो अर्थात्‌ उनके वास्तविक होने, सत्य होने का हमें विश्वास हो। हमारा अनुभव भी इस सिद्धांत की पुष्टि करता है। हम अन्य लोगों के साथ घटी घटनाओं को इतने विस्तार से याद नहीं रख पाते जितनी अपने साथ घटी घटनाओं को क्योंकि वे हमारे अनुभव का हिस्सा होती हैं। उनकी सत्यता के साक्षी हम स्वयं होते हैं। तो क्या इतिहास की विश्वसनीयता हमारे मन में हमारे मित्रों, परिजनों से अधिक होती है? साहित्य को तो हम मानते ही हैं कल्पनाजनित निर्माण। इसलिये हम उसके विवरणों को शायद ही याद रख पाते हों यद्यपि साहित्य हमारी भावना और बुद्धि का रख रखाव व पुनर्निर्माण करता है। साहित्य ही अपने व्यक्त और अव्यक्त रूप में हमारी आत्मा की पूर्ति का रूपक होता है, हमारी चेतना का उचित विस्तार भी। हमारी चेतना में समंजित साहित्य ही इतिहास से हमारी आत्मीयता बढ़ाता है। क्यों और किस तरह, इस पर पाठक अवश्य विचार करें।

 इतिहास एक ऐसी चेष्टा है जिसमें हम अपने समय से चलकर विगत के किसी प्रसंग या अवसर तक पहुंचने का प्रयास करते हैं। यह अपने समय से चलना एक विशेष बात है। कुछ लोग जो वैज्ञानिक ढंग के अधिक पक्षधर होते हैं वे इसे भिन्न शब्दों में व्यक्त करते हैं। उनका कहना है कि इतिहास वस्तुतः हमारे पास ज्ञानमीमांसा की प्रविधि और उपकरणों की जो जमापूंजी है उसके सहारे अतीत के अवशिष्ट अंश का विश्लेषण और पुनर्रचना का प्रयास है। लेकिन इतिहास के लेखन और अध्ययन में केवल इतना ही नहीं किया जाता। यदि हम इतना ही मात्र करते होते तो इतिहास में इतना वैविध्य नहीं होता, न ही इतनी पुनर्व्याखयायें होतीं। सच यह है कि हम अपने समय को साथ लेकर अतीत की यात्रा करते हैं और उसमें अपने छूट गये अंश का मिलान करते हैं। उसमें अपने कुछ की पहचान करते हैं। अपने की यह पहचान ही इतिहास की साहित्यिक प्रकृति का निर्माण करती है। इतिहास की साहित्यिक प्रकृति उसे अधिक स्वीकार्य, अधिक बोधगम्य और इसीलिये अधिक समस्यात्मक बनाती है।

हम अपने साथ अपने समय को किस रूप में लेकर चलने का प्रयास करते हैं। वे कौन सी चीजें हैं जो अतीत की यात्रा में हमारे पास होती हैं? यद्यपि वे हमारे साथ होती हैं पर क्या हम उनके होने को लेकर सचेत होते हैं? इन प्रश्नों के उत्तर उन चीजों को पहचानने में छुपे हैं जो हमारे समय का और प्रकारान्तर से हमारे स्व का, साथ ही हमारे निकट स्थित एक और अन्य या पर का निर्माण करती हैं। क्योंकि मनोविज्ञान का यह सुस्थापित सिद्धांत है कि किसी ‘स्व’ की पहचान या निर्धारण तभी संभव है जब उसकी स्थिति का किसी ‘पर’ या ‘अन्य’ के सापेक्ष निर्धारण किया जा सके। इस विषय में हम देखेंगे कि देश और धर्म हमारे समय के दो सर्वव्यापी और स्वीकृत ‘सत्‌’ हैं जो हमारे वर्तमान का निर्माण करते हैं। ये वे दो अक्ष हैं जिनके सापेक्ष हमारी सत्ता सदा होती है और समझी जाती है।

अच्छा हो यदि हम दो भिन्न प्रसंगों से इसे समझने का प्रयास करें। यदि इस प्रयास में कोई कटु अनुभव होता है तो उसे हमें अनदेखा करेंगे क्योंकि हमारा लक्ष्य अपनी चेतना को समृद्ध करने का होना चाहिये न कि नकात्मक भावों से उसे कुचलने का। निसंदेह इनमें एक प्रसंग पहले ‘सत्‌’ देश से जुड़ा है और दूसरा प्रसंग दूसरे ‘सत्‌’ धर्म से। इन दोनों के प्रस्तुत उल्लेख प्रसंग क्यों हैं और इतिहास की प्रकृति को समझने में हमारी किस प्रकार सहायता करते हैं? यह भी समझने का प्रयास हम करेंगे।

सबसे पहले हम ‘देश’ के बारे में बात करेंगे। धरती पर आज देश एक सुस्थापित सिद्धान्त है। हर व्यक्ति का एक देश निश्चित है। उस देश से उसका परिचय और पहचान जुड़ी हुई है। देश के विधि विधान, नागरिकता और पारपत्र उसकी पहचान को निर्धारित करते हैं। विभिन्न देशों के नागरिक न केवल अपने बल्कि अन्य देशों की भौगौलिक सीमाओं से परिचित हैं। लेकिन हमारे प्रयोजन से जुड़ा प्रश्न यह है कि क्या सदा से ऐसा रहा है? क्या वे देश जो आज हैं अतीत में उसी प्रकार स्थित थे? यह बात कि विगत समय में हमारा देश था या नहीं था अथवा किंचित भिन्न स्वरूप में था, उस विगत समय से हमारा संबंध ठीक उसी प्रकार बनाती है, जिस प्रकार हम आज अपने देश से संबंध रखते हैं। यह विषय बहुत बड़ा है और मनोविज्ञान, समाजशास्त्र जैसे बहुत से विषयों से जुड़ा हुआ है। हमारे लिये यह संभव नहीं है कि हम यहां उसका विस्तार से विवेचन कर सकें।

‘देश’ एक ऐसी सत्ता है जो लोगों को ठीक उसी प्रकार बांधती है जिस प्रकार कुल। ठीक जिस प्रकार अतीत में जाकर कुल के संबंध सूत्र धूमिल पड़ जाते हैं और वायवीय होकर लुप्त हो जाते हैं, उसी प्रकार देश की सत्ता अतीत में खो सी जाती है। फिर हम कुल पर कैसे गर्व करते हैं? इसके लिये नृजातीय कथायें और कतिपय बड़े व्यक्तियों के जीवन वृतांत ही सूत्र के रूप में काम करते हैं। देश के विषय में यही भूमिका उसके प्राचीन साहित्य और उसमें उल्लिखित प्रसंगों की होती है। इसलिये जहां वर्तमान में हमारा देश वह भौगौलिक स्थान होता है जिसमें हम रहते हैं, वहीं अतीत में हमारा देश उन जराजीर्ण ग्रन्थों में सन्निविष्ट रहता है जिनकी ओर हम शायद ही कभी ध्यान देते हों! कुछ शिथिल ढंग से हम कह सकते हैं कि हमारा देश हमारे साहित्य में निहित रहता है।

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या ये दोनो देश अर्थात्‌ अतीत और वर्तमान का देश सदैव समान होते हैं? यह हर उदाहरण के लिये सत्य नहीं है। मारीशस और सूरीनाम के व्यक्तियों के लिये या अमेरिका, न्यूजीलेण्ड के नागरिकों के लिये उनका वर्तमान देश और उनके अतीत का देश दो पृथक सत्ताएं हैं। उनका इतिहास उनके वर्तमान से, संभवतः उनके भविष्य से भी असंबंधित है। ऐसी स्थिति में इतिहास के प्रति उनकी मनोदशा उन लोगों से कितनी भिन्न होगी जिनके दोनो देश समान हैं, यह विचारणीय है। ऐसी परिस्थितियां किस प्रकार हमारे जीवन पर प्रभाव डालती हैं? ऐसे प्रश्न न केवल इतिहास बल्कि समाज विज्ञानों के लिये भी अत्यधिक गंभीर महत्व के हैं।

ऐसे भी लोग हो सकते हैं जिनके दो या अधिक देश हों। वैसे ही जैसे हमारे दो या अधिक कुल होते हैं। मातृकुल, पितृकुल और कभी कभी वह कुल भी जिसमें हमारा पालन पोषण होता है। लेकिन एक से अधिक जो कुछ होता है उसके लिये यदि सही शब्द का चयन किया जायेगा तो कहा जायेगा अपने आत्म को इतिहास में रख देना क्योंकि अन्य सभी विकल्प हमें अतीत से मिलते हैं। देश भी, गोत्र भी और गर्व या शर्म भी। दिलचस्प बात यह है कि यह दूसरे देश कभी कभी नकार भी दिये जाते हैं। हमारे समय में पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। तब क्या होता है जब किसी देश के नागरिक अपने देश की सत्ता को इतिहास में नकार देते हैं? यह प्रश्न इस बात को समझने के लिये बहुत जरूरी है कि इतिहास किस तरह हमें बांधता है?

अतीत हमें जोड़ता है। इस बात को हम अपने अतीत में सहजता से देख सकते हैं। हमारे सारे सम्बन्धों के सूत्र हमारे अतीत में निहित होते हैं। हमारी मां वह स्त्री है जिसने बीत गये समय में हमें पैदा किया। अतीत में किन्हीं स्त्री पुरुष का मिलना हुआ। कुछ अन्य लोगों की उपस्थिति और अनुमोदन से उनकी सम्बद्धता हुई। बहुत पहले चले गये लोगों द्वारा निर्धारित ढंग से रस्मो रिवाज दोहराये गये जिससे उनकी सम्बद्धता एक अधिक निश्चित सम्बन्ध, विवाह में बदली और हम अस्तित्व में आये। इसी प्रकार हमारे भाई बहन या अन्य कौटुम्बिक सम्बन्धी अतीत में हुई किसी घटना या कर्म की निष्पत्ति होते हैं। इतिहास की भाषा में इसका निरूपण कुछ इस तरह होगा कि विगत के तथ्य वर्तमान के रूप और दिशा का निर्धारण करते हैं।

ठीक इसी तरह से आधुनिक देशों का जन्म हुआ है। जिन तथ्यों का उपयोग कर एक निश्चित भूभाग के लोगों ने पारस्परिक सम्बन्ध को स्वीकार किया, उन्हीं तथ्यों की व्याख्याओं ने देश बनाये। यदि हम आज के संसार को ध्यान से देखें तो हमें वहीं अधिक कलह और बिखराव दिखेगा जहां लोगों के पास या तो इतिहास से सुसंगत जुड़ाव नहीं है या किसी कारण से उन्होंने अपने ही इतिहास को नकार दिया है।

देश के इस विचार को कुछ समय के लिये स्थगित कर अब हम एक दूसरी महत्वपूर्ण सत्ता ‘धर्म’ को देखते हैं। धर्म भी मानव जीवन में संगठन या बिखराव का बड़ा कारण है। साधारण व्यक्तियों के लिये यह बड़ी प्रेरक शक्ति है। सामर्थ्यशाली व्यक्तियों के लिये यह सम्पत्ति जैसा ही प्रबल हथियार है। धर्म कितना ही अस्पष्ट और अतार्किक हो लेकिन यह समाजों को परिभाषित करने, उनकी पहचान बनाने की सामर्थ्य रखता है।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि धर्म अतार्किक भय से जन्म लेता है। धार्मिक विवरण और आखयानों में हम निरंतर भयभीत करनेवाली शक्तियों से मनुष्य के पक्षधरों को लड़ते देखते हैं। ये पक्षधर अज्ञात और संयोग के भय का प्रतिकार करते हैं जो निश्चित ही मनुष्य के नियंत्रण से परे हैं। इसीलिये ये देव हैं, फरिश्ते हैं। पर धर्म इससे भिन्न कुछ है और निश्चित रूप से है। यह भिन्नता धर्मों के उस औपचारिक रूप में निहित है जो न केवल धार्मिक पाठ के अर्थ का निर्धारण करता है बल्कि उसके अनुयायियों को अनुशासित भी करता है।

प्रायः सभी धर्मों का एक आदि प्रारूप और धर्मग्रन्थ होता है। इतिहास के तथ्यों की तरह ही असंखय धर्म है जो अपने आदि प्रारूप तक ही सीमित रह गये। धरती पर ऐसे असफल धर्मों की संखया कम नहीं हैं। हमारे समय तक लेकिन कुछ ही धर्म आ पाये हैं। यह कोई संयोग है या सफल धर्मों का वैशिष्टय, यह भिन्न विषय है। हमारे लिये देखने की बात यह है कि धर्म हमें किन अर्थों में संगठित या विघटित करता है।

धर्मों के इतिहास में धर्मग्रन्थ की उपस्थिति एक स्थायी तथ्य की तरह होती है। लम्बी और सुदीर्घ परम्परायें धर्मग्रन्थों और उनमें वर्णित आखयानों की व्याख्याओं से भरी होती हैं। साधारण मनुष्य इनसे प्रायः पूरी तरह अनभिज्ञ होता है। धर्मग्रन्थ की अनगढ़ रचना से पढ़कर कुछ हासिल करना भी उसके लिये संभव नहीं होता। फिर भी वह अपने धर्म से किसी भी मूल्य पर चिपका रहना चाहता है। तो यह कौन सी शक्ति है जो धर्म को इतना महत्वपूर्ण बनाती है। और पहली सत्ता ‘देश’ से इसका क्या संबंध है? यह भी विचारणीय है।

किसी व्यक्ति के लिये या कुछ व्यक्तियों के लिये स्थानीय स्तर पर धर्म ठीक उसी तरह पहचान और स्थिति का निर्धारण करता है जिस तरह हमारे समाज में जाति करती है। धरती पर लोगों को धर्म से संगठन के निर्देश, परंपरायें और रीति रिवाज मिलते हैं। हम जो विभिन्न जातियों में बंट कर रहने के अभ्यस्त हैं, अपनी जातियों से वही निर्देश और सांगठनिक आधार प्राप्त करते हैं जो भारत से बाहर लोग अपने धर्म से प्राप्त करते हैं। हमारे धर्म लोगों को संगठित करने पर, उनकी अन्य मनुष्यों से भिन्न पहचान सुनिश्चित करने पर ध्यान नहीं देते, उसे बाध्यकारी नहीं बनाते लेकिन जाति इस काम को पूरी कट्‌टरता से करती है।

वे धर्म जिनका आदि स्रोत भारत से बाहर है मानव समाज का स्पष्ट विभाजन करते हैं। अपनों और परायों के लिये वहां स्पष्ट निर्देश और व्यवहार के प्रारूप हैं। उनके लिये ‘हम’ हर हाल में ‘अन्य’ से अच्छा और पक्षपोषणीय है। यहां तक कि इन ‘अन्यों’ से निरंतर संघर्षरत रहने, युद्ध की स्थिति में रहने के लिये कहा गया है। स्पष्टतः भारत में जो काम जाति करती है, भारत से बाहर वही काम धर्म करता है। वस्तुतः अभारतीय धर्म भारतीय जाति की तरह ही मजबूती से संगठित किंतु उसके विपरीत उन्माद की हद तक हिंसक और क्रूर और सामाजिक दृष्टि से बिखराव के लिये बाध्यकारी हैं।

यों सभी धर्म अपने अनुयायियों पर कर्तव्य और संगठन का भार रखते हैं। लेकिन अभारतीय धर्म इस विषय में अधिक कठोर हैं। उनमें संगठन की चेतना और अनुशासन की बाध्यता किसी भी मानवीय दायित्व से अधिक महत्वपूर्ण और अपरिहार्य है। इसके अतिरिक्त किसी भी अन्य पहचान के लिये उनमें अत्यधिक प्रतिरोध है। ईसाई धर्म के अनुशासन से मुक्ति के लिये यूरोपीय राष्ट्रीयताओं को सदियों तक संघर्ष करना पड़ा। वे विजयी हुईं तभी जाकर यूरोप में आधुनिक मानवीय समाज का जन्म हुआ। इस्लाम से राष्ट्रीयतायें नहीं जीत सकीं फलतः इस्लामिक समाज में सभ्यता के लिये लोगों का संघर्ष आज भी जारी है। इन विवरणों में हम देखते हैं कि धर्म एक बड़े और व्यापक किंतु अपवर्जी समाज को बनाने का प्रयास करता है और उसका यह प्रयास ही और अधिक विघटन का कारण बन जाता है।

जन साधारण की चेतना बहुत बड़े समाज के भार को सम्हाल नहीं सकती। उसका दैनिक जीवन पहचानों और रूपों की अनवरत आवश्यकताओं पर निर्भर होता है। उसे न केवल अपनी धार्मिक पहचान बल्कि अपने पड़ोसी से भिन्न पहचान, अपने भाई बहनों से भिन्न पहचान की जरूरत पड़ती है बल्कि उसके अपने अंतर्जगत में उसके भिन्न भिन्न समयों के लिये भी भिन्न पहचानों की जरूरत पड़ती है। धर्म या जाति का संगठन जब बहुत बड़ा हो जाता है ये पहचानें उसमें खोने लगती हैं इसीलिये धर्मों में से संप्रदाय और जातियों में से उपजातियां निकल पड़ती हैं। इसके बावजूद इन संप्रदायों के लिये धर्म प्रतीकों और परिभाषाओं का कच्चा माल मुहैया कराता रहता है। यह कच्चा माल परंपरा और इतिहास के माध्यम से आता है जहां यह इस हद तक परिवर्तित और परिवर्धित हो सकता है कि यह अपने मूल प्रारूप से बिल्कुल विपरीत हो जाये।

एक ही धर्म की विभिन्न स्थानीयताओं में इस बिखराव या भेद का कारण उपरिवर्णित ‘हम’ और ‘अन्य’ या ‘उन’ की धर्म तथा इतिहास की अर्थ सम्बन्धी भिन्नता में निहित है। अभारतीय धर्मों में हम और उन का विभाजन अधिक तीखा, अधिक आक्रामक और आवेगमय होता है। धर्मान्तरित समुदायों या व्यक्तियों के लिये यह एक त्रासद प्रक्रिया होती है क्योंकि उन्हें समाहित करने से पूर्व वे उनके इतिहास को उनसे छीन लेते हैं अथवा उसे छोड़ देने के लिये उन्हें बाध्य करते हैं। ये धर्म जीवन में धर्मान्तरित व्यक्ति का हिस्सा निरंतर कम करने की बात करते हैं। उनसे उनका स्वत्व छीन लेने का प्रयास करते हैं। उनका जीने का ढंग आरोपण और बलाधिकार का ढंग है। उनका लक्ष्य ‘हम’ के देशान्तरव्यापी विस्तार तथा ‘उन’ के उन्मूलन तक है। इसके विपरीत इतिहास हम और उन के मानवीय रूप को अपनाता है। इतिहास का ‘हम’ अधिक स्थानीय होता है। यह कई हमों का सम्मिलन भी हो सकता है और ‘उन’ के साथ सहअस्तित्व को स्वीकार करता है। इतिहास का हम नियत प्रारूप और स्रोत को स्वीकार नहीं करता बल्कि वह कई छोटे बड़े हमों को एक दूसरे में अंतर्विलयित होने, करने के लिये प्रयास करता है। इस परिच्छेद में हम और उन की बात यदि आपको गणितीय प्रतीत हो रही हो तो हम के स्थान पर किसी भी समुदाय या धर्म के नाम को रखकर पढ़ें, आपको बात स्पष्ट हो जायेगी।

 इतिहास पर बात शुरू करते समय हमने देखा था कि उसके विवरणों से उसके साहित्य होने का भ्रम होता है। देश की विभिन्न कालों की सत्ता भी उसके साहित्य में ही अधिक प्रभावी और सुसंगत ढंग से अभिव्यक्ति होती है। लेकिन धर्म का मसला इससे बिल्कुल अलग है। धर्म अपने प्रभाव और सत्ता के लिये दो अन्य सत्ताओं पर अत्यधिक निर्भर होता है। ये हैं साहित्य और भाषा। धर्म अपने प्रभाव और सार्थकता के लिये साहित्य से आखयान, प्रतीक, रूपक आदि उधार लेता है और भाषा से अर्थ, गठन की सरंचना और निर्देश सामग्री के लिये प्रारूप आदि। कठिनाई यह है कि साहित्य और भाषा, देश की तरह ही स्थानीय सत्तायें हैं जिनका स्थानांतरण सहज नहीं है। इससे इतना तो होता ही है कि अपने आदि काल में ही धर्म स्थान से आबद्ध हो जाता है, बंध जाता है।

तब क्या होता है जब स्थानबद्ध धर्म किसी न किसी कारण से दूसरे देश, दूसरी भाषा के लोगों के जीवन में प्रवेश करता है? यह एक ऐसी विचित्र स्थिति होती है जिसमें एक स्थान के लोग अपने स्वत्व को कम से कम सैद्धान्तिक रूप से अन्य लोगों के स्वत्व से बदल लेने की हामी भर लेते हैं। किन्हीं अन्य लोगों के देश, साहित्य और भाषा को अपने देश, अपने साहित्य और अपनी भाषा से अधिक महत्वपूर्ण और आदरणीय मान लेने की यह प्रवृत्ति मानवीय स्वभाव के अनुरूप नहीं है। इस कारण से अंतर्विरोध और क्लेश उत्पन्न होता है। यहीं से इतिहास की सामंजस्यकारी और दमनकारी शक्तियों का काम आरंभ हो जाता है। यह क्या है उसे हम तब देखेंगे जब धर्म के प्रभाव की विस्तृत विवेचना करेंगे। अभी हम अपने मूल प्रसंग इतिहास की ओर देखेंगे, यह समझने के लिये कि किस तरह यह हमारे ‘हम’ का निर्माण करता है?

देश और धर्म हमें तभी प्रभावित करते हैं जब हमारा कोई इतिहास होता है। इस अर्थ में इतिहास विज्ञान से पृथक सत्ता है। विज्ञान सार्वभौम होता है। हांलाकि तकनीक सार्वभौम नहीं होती, उसके राजनैतिक और सामाजिक पहलू भी होते हैं। अपने मूल स्वभाव में इतिहास साहित्य के अधिक निकट होता है। विज्ञान के अत्यधिक प्रभाव के इस युग में यह कथन प्रथमदृष्ट्‌या हास्यास्पद और अतार्किक लग सकता है, लेकिन है नहीं। आज सामाजिक विज्ञान मनुष्य के निकट पहुंच रहे हैं और उन बिन्दुओं पर विचार करने लगे हैं जिन्हें अभी तक वस्तुनिष्ठ सोच से अलग रखा जाता था। ये प्रश्न मानवीय भावना और संवेदना से जुड़े हुये भी हैं, नैतिक विमर्श से जुड़े भी हैं और मनुष्य की सत्ता से जुड़े प्रश्नों यथा गरिमा, अस्मिता, स्वाभिमान को भी विचार के घेरे में रखने के पक्ष में हैं।

इन स्थितियों में इतिहास की सत्ता को धर्म और देश दो सत्ताओं से बड़ी चुनौती मिलती है। इतिहास की हमारी समझ और विषय के रूप में उसकी स्थापना में इन दो सत्ताओं से संघर्ष की अपरिहार्यता को अनदेखा नहीं किया जा सकता। इतिहास हमारे संज्ञान की सत्ताओं को निरंतर एक बड़ी सत्ता में विलय करने के लिये प्रेरित करता है। यह बड़ी सत्ता समग्र मानवता की अंतिम सत्ता के रूप में ही व्याख्यायित की जा सकती है क्योंकि इतिहास उन सभी सीमाओं और परिधियों को आसानी से लांघ जाता है जिन्हें मनुष्य और समुदाय अपने स्वार्थ और लिप्सा की पूर्ति के लिये बनाते हैं। इसलिये इतिहास की हमारी समझ को व्याख्याओं की उन दिशाओं के अनुकूल होना चाहिये जो मानव निर्मित घेरों को तोड़ती है और समग्र मानवता की व्यापकतम परिधि का निर्माण करती है।