ऋग्वेदः 1.9.8

अस्मे धेहि श्रवो बृहद्द्युम्नं सहस्रसातमम्। इन्द्र ता रथिनीरिषः॥8॥

पदपाठ — देवनागरी
अ॒स्मे इति॑। धे॒हि॒। श्रवः॑। बृ॒हत्। द्यु॒म्नम्। स॒ह॒स्र॒ऽसात॑मम्। इन्द्र॑। ताः। र॒थिनिः॑। इषः॑॥ 1.9.8

PADAPAATH — ROMAN
iti | dhehi | śravaḥ | bṛhat | dyumnam | sahasra-sātamam | indra | tāḥ | rathiniḥ | iṣaḥ

देवता        इन्द्र:;       छन्द        गायत्री;       स्वर        षड्जः;      
ऋषि         मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः  

मन्त्रार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
हे (इन्द्र) अत्यन्त बलयुक्त ईश्वर! आप (अस्मे) हमारे लिये, (सहस्रसातमं) असंख्यात सुखों का मूल, (बृहत्) नित्य वृद्धि को प्राप्त होने योग्य, (द्युम्नं) प्रकाशमय ज्ञान तथा, (श्रवः) पूर्वोक्त धन और, (रथिनीरिषः) अनेक रथ आदि साधन सहित सेनाओं को, (धेहि) अच्छे प्रकार दीजिये॥8॥

भावार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
हे जगदीश्वर ! आप कृपा करके जो अत्यन्त पुरुषार्थ के साथ जिस धन करके बहुत से सुखों को सिद्ध करनेवाली सेना प्राप्त होती है, उसको हम लोगों में नित्य स्थापन कीजिये॥8॥

रामगोविन्द त्रिवेदी (सायण भाष्य के आधार पर)
8. इन्द्र! हमें महतो कीर्ति, बहुदान-सामर्थ्ययुक्त धन और अनेक रथपूर्ण अन्न दान करो।

Ralph Thomas Hotchkin Griffith
8. Grant us high fame, O Indra, grant riches bestowing thousands, those Fair fruits of earth borne home in wains. 

Translation of Griffith Re-edited  by Tormod Kinnes
Grant us high fame, Indra, grant riches bestowing thousands, those Fair fruits of earth borne home in wains. [8]

Horace Hayman Wilson (On the basis of Sayana)
8. Indra, grant us great renown and wealth acquired in a thousand ways, and those (articles) of food (which are brought from the field) in carts.
The original of this hymn, as of many others, is so concise and elliptical, as to be unintelligible without the liberal amplification of the Scholiast.
We have in the text simply, those car- having viands, ta rathinir-isah, meaning Sayana says, those articles of food which are conveyed in cars, carts, or wagons, from the site of their production; as rice, barley, and other kinds of grain.

ऋग्वेदः 1.9.7

सं गोमदिन्द्र वाजवदस्मे पृथु श्रवो बृहत्। विश्वायुर्धेह्यक्षितम्॥7॥

पदपाठ — देवनागरी
सम्। गोऽम॑त्। इ॒न्द्र॒। वाज॑ऽवत्। अ॒स्मे इति॑। पृ॒थु। श्रवः॑। बृ॒हत्। वि॒श्वऽआ॑युः। धे॒हि॒। अक्षि॑तम्॥ 1.9.7

PADAPAATH — ROMAN
sam | go–mat | indra | vāja-vat | asme iti | pṛthu | śravaḥ | bṛhat | viśva-āyuḥ | dhehi | akṣitam

देवता        इन्द्र:;       छन्द        निचृद्गायत्री ;       स्वर        षड्जः;      
ऋषि         मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः  

मन्त्रार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
हे (इन्द्र) अनन्त विद्यायुक्त सबको धारण करने हारे ईश्वर! आप (अस्मे) हमारे लिये, (गोमत्) जो धन श्रेष्ठ वाणी और अच्छे-2 उत्तम पुरुषों को प्राप्त कराने, (वाजवत्) नानाप्रकार के अन्न आदि पदार्थों को प्राप्त कराने वा, (विश्वायुः) पूर्ण सौ वर्ष वा अधिक आयु को बढ़ाने, (पृथु) अति विस्तृत, (बृहत्) अनेक शुभगुणों से प्रसिद्ध अत्यन्त बड़ा, (अक्षितं) प्रतिदिन बढ़नेवाला, (श्रवः) जिसमें अनेक प्रकार की विद्या वा सुवर्ण आदि धन सुनने में आता है। उस धन को, (संधेहि) अच्छे प्रकार नित्य के लिये दीजिये॥7॥

भावार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
मनुष्यों को चाहिये कि ब्रह्मचर्य्य का धारण, विषयों की लंपटता का त्याग,भोजन आदि व्यवहारों के श्रेष्ठ नियमों से विद्या और चक्रवर्त्ति राज्य की लक्ष्मी को सिद्ध करके सम्पूर्ण आयु भोगने के लिये पूर्वोक्त धन के जोड़ने की इच्छा अपने पुरुषार्थ द्वारा करें कि जिससे इस संसार का वा परमार्थ का दृढ़ और विशाल अर्थात् अतिश्रेष्ठ सुख सदैव बना रहे, परन्तु यह उक्त सुख केवल ईश्वर की प्रार्थना से ही नहीं मिल सकता, किन्तु उसकी प्राप्ति के लिये पूर्ण पुरुषार्थ भी करना अवश्य उचित है॥7॥

रामगोविन्द त्रिवेदी (सायण भाष्य के आधार पर)
7. इन्द्रदेव! गौ और अन्न से युक्त, प्रचुर और विस्तृत, सारी आयु चलने योग्य और अक्षय धन हमें दो।

Ralph Thomas Hotchkin Griffith
7. Give, Indra, wide and lofty fame, wealthy in cattle and in strength, Lasting our life-time, failing not. 

Translation of Griffith Re-edited  by Tormod Kinnes
Give, Indra, wide and lofty fame, wealthy in cattle and in strength, Lasting our life-time, failing not. [7]

Horace Hayman Wilson (On the basis of Sayana)
7. Grant us, Indra, wealth beyond measure or calculation, inexhaustible, the source of cattle, of food, of all life.

ऋग्वेदः 1.9.6

अस्मान्त्सु तत्र चोदयेन्द्र राये रभस्वतः। तुविद्युम्न यशस्वतः॥6॥

पदपाठ — देवनागरी
अ॒स्मान्। सु। तत्र॑। चो॒द॒य॒। इन्द्र॑। रा॒ये। रभ॑स्वतः। तुवि॑ऽद्युम्न। यश॑स्वतः॥ 1.9.6

PADAPAATH — ROMAN
asmān | su | tatra | codaya | indra | rāye | rabhasvataḥ | tuvi-dyumna | yaśasvataḥ

देवता        इन्द्र:;       छन्द        पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री;      
स्वर       षड्जः;       ऋषि         मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः  

मन्त्रार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
हे (तुविद्युम्न) अत्यन्त विद्यादिधनयुक्त, (इन्द्र) अन्तर्यामी ईश्वर! (रभस्वतः) जो आलस्य को छोड़ के कार्य्यों के आरम्भ करने, (यशस्वतः) सत्कीर्ति सहित, (अस्मान्) हमलोग पुरुषार्थी विद्या धर्म और सर्वोपकार से नित्य प्रयत्न करनेवाले मनुष्यों को, (तत्र) श्रेष्ठ पुरुषार्थ में, (राये) उत्तम-2 धन की प्राप्ति के लिये, (सुचोदय) अच्छी प्रकार युक्त कीजिये॥6॥

भावार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
सब मनुष्यों को उचित है कि इस सृष्टि में परमेश्वर की आज्ञा के अनुकूल वर्त्तमान तथा पुरुषार्थी और यशस्वी होकर विद्या तथा राज्यलक्ष्मी की प्राप्ति के लिये सदैव उपाय करें। इसीसे उक्त गुणवाले पुरुषों ही को लक्ष्मी से सब प्रकार का सुख मिलता है, क्योंकि ईश्वर ने पुरुषार्थी सज्जनों ही के लिये सब सुख रचे हैं॥6॥

रामगोविन्द त्रिवेदी (सायण भाष्य के आधार पर)
6. अनन्त-सम्पतिशाली इन्द्र! धन-सिद्धि के लिए हमें इस कर्म में संयुक्त करो। हम उद्योगी और यशस्वी हैं।

Ralph Thomas Hotchkin Griffith
6. O Indra, stimulate thereto us emulously fain for wealth, And glorious, O most splendid One. 

Translation of Griffith Re-edited  by Tormod Kinnes
Indra, stimulate thereto us emulously fain for wealth, And glorious, most splendid One. [6]

Horace Hayman Wilson (On the basis of Sayana)
6. Opulent Indra, encourage us in this rite for the acquirement of wealth, for we are diligent and renowned.

ऋग्वेदः 1.9.5

सं चोदय चित्रमर्वाग्राध इन्द्र वरेण्यम्। असदित्ते विभु प्रभु॥5॥

पदपाठ — देवनागरी
सम्। चो॒द॒य॒। चि॒त्रम्। अ॒र्वाक्। राधः॑। इ॒न्द्र॒। वरे॑ण्यम्। अस॑त्। इत्। ते॒। वि॒ऽभु। प्र॒ऽभु॥ 1.9.5

PADAPAATH — ROMAN
sam | codaya | citram | arvāk | rādhaḥ | indra | vareṇyam | asat | it | te | vi-bhu | pra-bhu

देवता        इन्द्र:;       छन्द        पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री;      
स्वर       षड्जः;       ऋषि         मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः  

मन्त्रार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
हे (इन्द्र) करुणामय सब सुखों के देनेवाले परमेश्वर! (ते) आपकी सृष्टि में जो-2, (वरेण्यं) अतिश्रेष्ठ, (विभु) उत्तम-2 पदार्थों से पूर्ण, (प्रभु) बडे-2 प्रभावों का हेतु, (चित्रं) जिससे श्रेष्ठ विद्या चक्रवर्त्ति राज्य से सिद्ध होनेवाले मणि सुवर्ण और हाथी आदि अच्छे-2 अद्भुत पदार्थ होते हैं ऐसा, (राधः) धन, (असत्) हो सो-2 कृपा करके हमलोगों के लिये, (संचोदय) प्रेरणा करके प्राप्त कीजिये॥5॥

भावार्थ महर्षि दयानन्द सरस्वती
मनुष्य को ईश्वर के अनुग्रह और अपने पुरुषार्थ से आत्मा और शरीर के सुख के लिये विद्या और ऐश्वर्य्य की प्राप्ति वा उनकी रक्षा और उन्नति तथा सत्य मार्ग वा उत्तम दानादि धर्म अच्छी प्रकार से सदैव सेवन करना चाहिये, जिससे दारिद्र्य और आलस्य से उत्पन्न होनेवाले दुःखों का नाश होकर अच्छे-2 भोग करने योग्य पदार्थों की वृद्धि होती रहे॥5॥
               यह सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

रामगोविन्द त्रिवेदी (सायण भाष्य के आधार पर)
5. इन्द्रदेव! उत्तम और नानाविध सम्पत्ति हमारे सामने भेजो। पर्याप्त और प्रचुर धन तुम्हारे पास ही है।

Ralph Thomas Hotchkin Griffith
5. Send to us bounty manifold, O Indra, worthy of’ our wish, For power supreme is only thine. 

Translation of Griffith Re-edited  by Tormod Kinnes
Send to us bounty manifold, Indra, worthy of’ our wish, For power supreme is only your. [5]

Horace Hayman Wilson (On the basis of Sayana)
5. Place before us, Indra, precious and multiform riches, for enough and more than enough are assuredly your.

ऋग्वेदः 1.9.4

असृग्रमिन्द्र ते गिरः प्रति त्वामुदहासत। अजोषा वृषभं पतिम्॥4॥

पदपाठ देवनागरी
असृ॑ग्रम्। इ॒न्द्र॒। ते॒। गिरः॑। प्रति॑। त्वाम्। उद्। अ॒हा॒स॒त॒। अजो॑षाः। वृ॒ष॒भम्। पति॑म्॥ 1.9.4

PADAPAATH — ROMAN
asṛgram | indra | te | giraḥ | prati | tvām | ud | ahāsata | ajoṣāḥ | vṛṣabham | patim

देवता        इन्द्र:;       छन्द        गायत्री;       स्वर        षड्जः;      
ऋषि         मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः  

मन्त्रार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
(इन्द्र) हे परमेश्वर! जो (ते) आपकी, (गिरः) वेदवाणी हैं वे, (वृषभं) सबसे उत्तम सबकी इच्छा पूर्ण करनेवाले, (पतिं) सबके पालन करनेहारे, (त्वां) वेदों के वक्ता आपको, (उदहासन) उत्तमता के साथ जनाती हैं और, जिन वेदवाणियों का आप, (अजोषाः) सेवन करते हो। उन्हीं से मैं भी, (प्रति) उक्त गुणयुक्त आपको, (असृग्रं) अनेक प्रकार से वर्णन करता हूँ॥4॥

भावार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
जिस ईश्वर ने प्रकाश किये हुये वेदों से जैसे अपने-2 स्वभाव गुण और कर्म प्रकट किये हैं, वैसे ही वे सब लोगों को जानने योग्य हैं, क्योंकि ईश्वर के सत्य स्वभाव के साथ अनन्तगुण और कर्म हैं, उनको हम अल्पज्ञ लोग अपने सामर्थ्य से जानने को समर्थ नहीं हो सकते। तथा जैसे हम लोग अपने-2 स्वभाव गुण और कर्मों को जानते हैं, वैसे औरों को उनका यथावत् जानना कठिन होता है, इसी प्रकार सब विद्वान् मनुष्यों को वेदवाणी के बिना ईश्वर आदि पदार्थों को यथावत् जानना कठिन है।इसलिये प्रयत्न से वेदों को जानके उनके द्वारा सब पदार्थों से उपकार लेना तथा उसी ईश्वर को अपना इष्टदेव और पालन करनेहारा मानना चाहिये॥4॥

रामगोविन्द त्रिवेदी (सायण भाष्य के आधार पर)
4. इन्द्र! मैंने तुम्हारी स्तुति की है। तुम इच्छित-वर्षक और पालन-कर्ता हो। मेरी स्तुति तुम्हें प्राप्त हुई है; तुमने उसे ग्रहण कर लिया है।

Ralph Thomas Hotchkin Griffith
4. Songs have outpoured themselves to thee, Indra, the strong, the guardian Lord, And raised themselves unsatisfied. 

Translation of Griffith Re-edited  by Tormod Kinnes
Songs have outpoured themselves to you, Indra, the strong, the guardian Lord, And raised themselves unsatisfied. [4]

Horace Hayman Wilson (On the basis of Sayana)
4. I have addressed to you, Indra, the showerer (of blessings), the protector (of your worshippers), praises which have reached you, and of which you have approved.
Reached You- The Scholiast makes this, reached you in heaven, or Svarga. It may be questioned if the Veda recognizes Svarga as the heaven of Indra.1


1. (emphasised by us – ed.)

ऋग्वेदः 1.9.3

मत्स्वा सुशिप्र मन्दिभिः स्तोमेभिर्विश्वचर्षणे। सचैषु सवनेष्वा॥3॥

पदपाठ — देवनागरी
मत्स्व॑। सु॒ऽशि॒प्र॒। म॒न्दिऽभिः। स्तोमे॑भिः। वि॒श्व॒ऽच॒र्ष॒णे॒। सचा॑। ए॒षु। सव॑नेषु। आ॥ 1.9.3

PADAPAATH — ROMAN
matsva | su-śipra | mandi-bhiḥ | stomebhiḥ | viśva-carṣaṇe | sacā | eṣu | savaneṣu | ā

देवता        इन्द्र:;       छन्द        निचृद्गायत्री ;       स्वर        षड्जः;      
ऋषि         मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः  

मन्त्रार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
हे (विश्वचर्षणे) सब संसार के देखने तथा, (सुशिप्र) श्रेष्ठ ज्ञानयुक्त परमेश्वर! आप (मन्दिभिः) जो विज्ञान वा आनन्द के करने वा करानेवाले, (स्तोमेभिः) वेदोक्त स्तुतिरूप गुणप्रकाश करनेहारे स्तोत्र हैं उनसे स्तुति को प्राप्त होकर, (एषु) इन प्रत्यक्ष, (सवनेषु) ऐश्वर्य्यदेने वाले पदार्थों में हमलोगों को, (सचा) युक्त होकर, (मत्स्व) अच्छे प्रकार आनन्दित कीजिये॥3॥

भावार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती
जिसने संसार के प्रकाश करनेवाले सूर्य्य को उत्पन्न किया है, उसकी स्तुति करने में जो श्रेष्ठपुरुष एकाग्रचित्त हैं, अथवा सबको देखनेवाले परमेश्वर को जानकर सब प्रकार से धार्मिक और पुरुषार्थी होकर सब ऐश्वर्य्य को उत्पन्न और उसकी रक्षा में मिलकर रहते हैं, वे ही सब सुखों को प्राप्त होने के योग्यवा औरों को भी उत्तम-2 सुखों के देनेवाले हो सकते हैं॥3॥

रामगोविन्द त्रिवेदी (सायण भाष्य के आधार पर)
3. हे सुन्दर नासिकावाले और सबके अधीश्वर इन्द्र! प्रसन्नताकारक स्तुतियों से प्रसन्न हो और देवों के साथ इस सवन-यज्ञ में पधारो।

Ralph Thomas Hotchkin Griffith
3. O Lord of all men, fair of cheek, rejoice thee in the gladdening lauds, Present at these drink-offerings. 

Translation of Griffith Re-edited  by Tormod Kinnes
Lord of all men, fair of cheek, rejoice you in the gladdening lauds, Present at these drink-offerings. [3]

Horace Hayman Wilson (On the basis of Sayana)
3. Indra with the handsome chin, be pleased with these animating praises: do your, who are to be reverenced by all mankind, (come) to these rites (with the gods).
With the Handsome Chin- Su-sipra; but Sipra means either the lower jaw, or the nose,1. and the compound may equally denote the handsome-nosed.
Reverenced by all Mankind- The epithet, visvacarsane, is literally, oh! your who are all men, or as Sayana explains it, sarva­manusya-yukta, who are joined with all men, which he qualifies as, sarvair yajamanaib pujyah, to be worshipped by all institutors of sacrifices. It may be doubted if this be all that is intended; Rosen renders it, omnium hominum domine; M. Langlois has, maitre souverain.